हर व्यक्ति अपने सुख और कामनाओँ की पूर्ति के लिए भगवान से प्रार्थना करता है और उनकी विधि विधान से पूजा अर्चना करता है। अपने सुखों की प्राप्ति के लिए और कष्टों से मुक्ती के लिए भक्त देवी देवताओं की पूजा करते है उनही में एक देवी है माता बगलामुखी। हिंदू धर्म में बगलामुखी जयंती का विशेष महत्व है. इस साल मां बगलामुखी की जयंती 25 अप्रैल को मनाई जा रही है जो इस साल 2026 का बहुत ही शुभ संयोग में होगा। मां बगलामुखी को शत्रुओं को पराजित करने, कर्ज से मुक्ति और रोगों, बिमारियों से राहत दिलाने वाली मानी जाती हैं।

माता को पीला रंग बहुत प्रिय है इसिलिए इन्हें पीताम्बरा भी कहा जाता है।मान्यता है कि इनकी पूजा करने से विरोधियों पर जीत मिलती है। कहा जाता है यदि सारे ब्रह्मांड की शक्तियां मिल भी जाए तो वह मां बगलामुखी का मुकाबला नहीं कर सकती हैं.
मां बगलामुखी दस महाविद्याओं में आठवीं देवी हैं. मां बगलामुखी को ‘स्तंभन शक्ति’ की देवी कहा जाता है, मान्यताओं के अनुसार, बगलामुखी जयंती पर की गई साधना विशेष फलदायी होती है और सभी मनोकामओं की पूर्ति होती है। कोर्ट-कचहरी के मामलों या वाद-विवाद में सफलता पाने के लिए माँ.. बगलामुखी की साधना अचूक मानी जाती है. विशेषतौर पर तांत्रिक साधना के लिए मां बगलामुखी की पूजा प्रसिद्ध है.

शुभ मुहुर्त

सुबह पूजा मुहूर्त – सुबह 5.47 – सुबह 10.41
मां बगलामुखी पूजा मंत्र
ॐ ह्लीं बगलामुखि सर्वदुष्टानां वाचं मुखं पदं स्तम्भय जिव्हां कीलय बुद्धिं विनाशय ह्लीं ॐ स्वाहा।

पूजा विधि

इस दिन प्रातः स्नान कर पीले वस्त्र पहनें और पूजा स्थल को गंगाजल से शुद्ध करें.

मां बगलामुखी की मूर्ति या चित्र की स्थापना करें और उन्हें हल्दी, चना, पीले फूल, पीली मिठाई अर्पित करें.

मां के मंत्र का 108 बार जप करें.

दीपक और धूप जलाकर आरती करें और मां से अपने कष्टों को दूर करने की प्रार्थना करें.

मां बागलामुखी की कथा

पौराणिक कथा के अनुसार एक बार सतयुग में महाविनाश उत्पन्न करने वाला ब्रह्मांडीय तूफान उत्पन्न हुआ, जिससे संपूर्ण विश्व नष्ट होने लगा इससे चारों ओर हाहाकार मच गया। भगवान विष्णु जी चिंतित हो गए। और वह भगवान शिव को स्मरण करने लगे, तब भगवान शिव ने कहा शक्ति रूप देवी इस प्रलय को रोक सकती हैं. बस फिर क्या था भगवान विष्णु ने कठिन तपस्या की थी, और माता बगलामुखी प्रकट हुई।

मां बगलामुखी के प्रसिद्ध मंदिर

भारत में मां बगलामुखी के तीन मुख्य सिद्धपीठ हैं- हिमाचल प्रदेश (बनखंडी), नलखेड़ा (मध्य प्रदेश), और दतिया मध्यप्रदेश)

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