छठ पूजा का उषा अर्घ्य 28 अक्टूबर मंगलवार के दिन दिया जाएगा।
पंचांग के अनुसार, सूर्योदय का समय और उषा अर्घ्य का शुभ मुहूर्त सुबह लगभग 06 बजकर 30 मिनट से शुरू होगा जो सुबह 06 बजकर 37 मिनट तक रहेगा।
छठ महापर्व का चौथा और आखिरी दिन कार्तिक माह की सप्तमी तिथि को होता है
जिसमें इस दिन उगते सूर्य को अर्घ्य देने के बाद व्रत का पारण का होता है।
28 अक्तूबर 2025 को उगते सूर्य को अर्घ्य दिया जाएगा। इसके बाद ही 36 घंटे का व्रत समाप्त होता है।
उगते सूर्य देव की पूजा विधि
छठ पूजा के लिए दो बड़े बांस की टोकरी लें, अब पीतल की टोकरी का भी चलन हो गया है। जिन्हें पथिया और सूप के नाम से जाना जाता है।
इसके साथ ही डगरी, पोनिया, ढाकन, कलश, पुखार, सरवा भी जरूर रख लें।
इसके साथ ही बांस या पीतल की टोकरी में भगवान सूर्य देव को अर्पित करने वाला भोग रखा जाता है। जिनमें ठेकुआ, मखान, अक्षत, भुसवा, सुपारी, अंकुरी, गन्ना आदि चीजें शामिल हैं।
इसके अलावा टोकरी में पांच प्रकार के फल जैसे शरीफा, नारियल, केला, नाशपाती और डाभ (बड़ा वाला नींबू) रखा जाता है।
इसके साथ ही टोकरी में पंचमेर यानी पांच रंग की मिठाई रखी जाती है। जिन टोकरी में आप छठ पूजा के लिए प्रसाद रख रहे हैं उन पर सिंदूर और पिठार जरूर लगाया जाता है । भगवान सूर्य देव को अर्घ्य देने के लिए बांस या पीतल की टोकरी या सूप का उपयोग करना चाहिए।

रात भऱ रहती है रौनक
उगते हुए सूर्य को जल देने के लिए रात भऱ बड़ी रौनक रहती है। व्रती और श्रद्धालु तड़के सुबह ही घाट पर पहुंच जाते हैं और सूर्योदय का इंतजार करते हुए जल में खड़े रहते हैं। व्रती श्रद्दालु भोर में ही पवित्र जल मे खड़े हो जाते है वे तब तक खड़े रहते है जब तक सूर्य देव की उगती किरण ना दिख जाए सूर्य़ देव के उगते हुए यानी सूर्य की पहली किरणें दिखते ही, व्रती पिछले दिन की तरह ही सूप में रखे प्रसाद के साथ, दूध और जल से उगते हुए सूर्य देव को अर्घ्य देते हैं।
अर्घ्य देने के बाद, व्रती छठी मैया से सुख- समृद्धि का आशीर्वाद मांगते हैं और घाट पर ही प्रसाद वितरण करते हैं। इसके बाद, व्रती प्रसाद ग्रहण करके अपना 36 घंटे का कठिन व्रत पारण करते हैं, जिसके साथ ही महापर्व का समापन हो जाता है। उगते सूर्य को अर्घ्य देना एक नई शुरुआत, नई आशा, नई जीवन शक्ति और प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करने का प्रतीक है।
सूर्य पुत्र कर्ण से भी जुड़ी छठ व्रत की कहानी
चौथे दिन यानी अंतिम दिन उगते हुए सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है , जिसके बाद ये महापर्व संपन्न होगा. इस महापर्व को लेकर कई कथाएं और कहानियां प्रचलित हैं. इस महापर्व की एक कहानी सूर्य पुत्र कर्ण से भी जुड़ी हुई है. सूर्य पुत्र कर्ण की गिनती महाभारत के महान योद्धाओं में होती है.इसके साथ ही कर्ण की बहादुरी, दानवीरता और धर्म के प्रति आस्था से आज भी लोग प्रेरणा लेते हैं. कर्ण सूर्यदेव के पुत्र थे. माता कुंति ने सूर्य देव के मंत्रों का जाप किया था. माता कुंती ने सूर्य मंत्र के जाप से ही कर्ण को जन्म दिया था, लेकिन समाजिक डर से कुंती ने कर्ण को नदी में बहा दिया. कर्ण में सूर्य देव का आशीर्वाद और दिव्यता थी जिसके कारण कर्ण भगवान सूर्य के भक्त थे।
सूर्य पुत्र कर्ण ने की थी छठ पूजा
कहा जाता है कर्ण सूर्यपुत्र थे, इसलिए छठ पूजा का महत्व जानकर उन्होंने रोजाना सुबह सूर्य नमस्कार करना और सूर्य को अर्घ्य देना शुरू किया. साथ ही वो छठी मैया की स्तुति भी किया करते थे. इस तरह से महाभारत काल में बिहार और पूर्वांचल को छठ पूजा की परंपरा स्थाई रूप से मिली जो अभी तक बनी हुई है आगे भी बनी रहेगी।


