पूर्व विशेष मुख्य सचिव और द केबीएस क्रॉनिकल के संस्थापक-संपादक कर्ण बीर सिंह सिद्धू ने गांधी जयंती के मौके पर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को संबोधित करते हुए SIR के बाद मतदाता सूचियों में हुए बदलाव को लेकर सवाल उठाए हैं।
सिद्धू ने दावा किया है कि चुनाव आयोग की ओर से 1 अक्टूबर को जारी एक सर्कुलर में SIR से पहले और बाद की मतदाता सूचियों की तुलना करने तथा गायब मतदाताओं की पहचान के लिए विशेष अभियान चलाने के निर्देश दिए गए हैं। उनके मुताबिक, यह कदम इस बात की ओर संकेत करता है कि SIR के दौरान कुछ पात्र मतदाताओं के नाम सूची से हटे हो सकते हैं। यह उनकी ओर से किया गया दावा है; चुनाव आयोग ने इस सर्कुलर को गलत तरीके से हटाए गए नामों की स्वीकारोक्ति के रूप में पेश नहीं किया है।
BLO घर-घर जाकर करेंगे सर्वे
सिद्धू के अनुसार, सर्कुलर में बूथ लेवल अधिकारियों (BLO) को पुरानी और मौजूदा मतदाता सूचियों का मिलान करने के निर्देश दिए गए हैं। इसके तहत BLO को करीब एक महीने तक घर-घर जाकर ऐसे मतदाताओं की जानकारी जुटाने, जरूरत पड़ने पर फॉर्म-6 भरने और तैयार सूचियों को बूथ लेवल एजेंटों के साथ साझा करने की प्रक्रिया अपनानी है।
सर्कुलर में बेघर और अन्य वंचित वर्गों को भी अभियान के दायरे में शामिल करने की बात कही गई है।
पहले भी SIR को लेकर सवाल उठा चुके हैं
कर्ण बीर सिंह सिद्धू इससे पहले भी SIR की प्रक्रिया को लेकर कई लेख लिख चुके हैं। उन्होंने आशंका जताई थी कि मतदाता सूची के मिलान और सत्यापन की प्रक्रिया में पात्र मतदाताओं के नाम प्रभावित हो सकते हैं। मई 2026 में उन्होंने पंजाब और चंडीगढ़ के मतदाताओं के लिए SIR को लेकर एक विस्तृत गाइड भी प्रकाशित की थी।
तीन मुद्दों पर उठाए सवाल
सिद्धू ने अपने ताजा लेख में विशेष अभियान से जुड़े तीन प्रमुख मुद्दे उठाए हैं। उनका कहना है कि:
- पुराने मतदाता डेटा के लिंकिंग से जुड़ी समस्याओं का समाधान स्पष्ट नहीं है।
- नाम हटने के कारण बने मिलान सिस्टम या प्रक्रिया की समीक्षा का सवाल बना हुआ है।
- 2027 में होने वाले विधानसभा चुनावों को देखते हुए सुधार के लिए उपलब्ध समय सीमित है।
उन्होंने चुनाव आयोग की भूमिका और संविधान के अनुच्छेद 324 से जुड़े मुद्दों पर भी अपनी राय रखी है। सिद्धू ने सुप्रीम कोर्ट के Association for Democratic Reforms v. Election Commission of India मामले और T.N. Seshan v. Union of India के फैसले का हवाला देते हुए चुनाव आयोग की संस्थागत जवाबदेही पर जोर दिया है


