बृहस्पतिवार को लक्ष्मीपति विष्णु और देवों के गुरु बृहस्पति जी की पूजा का विधान है. गुरुवार का व्रत अत्यंत फलदायी माना गया है. मान्यता है कि यह व्रत रखने से भगवान विष्णु प्रसन्न होते हैं और सुख समृद्धि की वर्षा करते हैं.माना जाए तो सभी चीजें भगवान ही हर व्यक्ति को देते है तो भला इंसान की क्या हैसियत की भगवान को कुछ दे सकते ,लेकिन भक्त अपनी श्रद्दा के अनुसार भगवान को चढ़ावा चढ़ाते है वैसे तो सच्चे मन और श्रद्धा से भगवान को जो भी अर्पण किया जाए, भगवान उसे प्रसन्नतापूर्वक ग्रहण करते हैं. चाहे वो शबरी द्वारा खिलाए गए झूठे बेर हों जो प्रभु श्री राम ने खाया था या फिर विदुरानी द्वारा निवेदित किये गए केले के छिलके हों, क्या आपको पता है भगवान विष्णु को गुड़ और चने की दाल अत्यधिक प्रिय है
भगवान विष्णु की पूजा कैसे करें
अगर आप गुरुवार के दिन व्रत रखते है तो आप प्रात: उठते ही भगवान विष्णु को स्मरण कर व्रत का संकल्प ले. स्नान करने के बाद पूजा घर में भगवान विष्णु की मूर्ति या चित्र की स्थापना करनी चाहिए. उन्हें पीले रंग के पुष्प, फल और अक्षत अर्पित करें. भगवान विष्णु को चना गुड़ का भोग लगाए
भगवान विष्णु की कथा करें आरती करने के बाद केले के पेड़ को जल अर्पण करें। भगवान विष्णु को पीला रंग अत्यंत प्रिय है. पीला रंग धारण करने के कारण उन्हें पीतांबर भी कहते हैं. उन्हें पीले रंग के फूल व फलों का भोग लगाना चाहिए. पीले रंग के चना दाल और गुड़ को मिलाकर भी चढ़ाएं.
भगवान विष्णु के चने दाल के भोग की कथा
भगवान विष्णु के परमभक्त देवर्षि नारद आत्मा का ज्ञान लेने की आकांक्षा रखते थे परंतु वे जब भी अपनी इस इच्छा को भगवान के सम्मुख प्रकट करते तो भगवान हमेशा यह कहकर टाल देते कि वे अभी इस योग्य नहीं हैं. नारद जी ने योग्य बनने के लिए कठोर जप-तप किया परंतु अनेकों बार प्रयास करने पर भी जब श्रीहरि नहीं माने तो निराश मन से नारद जी पृथ्वी लोक की सैर करने चल दिए. चलते-चलते उनकी दृष्टि एक मंदिर पर पड़ी, जहां स्वयं भगवान विष्णु विराजमान थें
और एक वृद्धा उन्हें अपने हाथों से कुछ खिला रही थी, जिसे प्रभु बड़े प्रेम से खा भी रहे थे. यह देखकर देवर्षि नारद के मन में अत्यंत उत्सुकता हुई कि आखिर ऐसा क्या है, जिसे ग्रहण करने स्वयं प्रभु बैकुंठ से धरातल पर आए हैं. श्रीहरि के वहां से जाने के बाद नारद जी उस वृद्धा के पास गए और बड़ी उत्सुकता से उनसे पूछा कि “हे माता! वो ऐसी कौन सी दिव्य सामग्री थी, जिसे श्रीहरि आपके हाथों से इतने प्रेमपूर्वक ग्रहण कर रहे थे.” इस पर वो वृद्धा बोली, “देवर्षि नारद, मैं प्रभु को गुड़ एवं चने की दाल का भोग लगा रही थी.”
नारद जी की तपस्या
यह सुनने के बाद नारद जी उसी स्थान पर रहकर श्रीहरि का पूजन करने लगे और उन्हें गुड़ एवं चने की दाल भोग लगाकर प्रसाद सबको बाटने लगे. यह देखकर विष्णु जी अत्यंत प्रसन्न हुए और वहां प्रकट होकर नारद जी को आत्मा का ज्ञान दिया और उस वृद्ध भक्त को मोक्ष प्रदान किया.
श्रीहरि बोले, “जो व्यक्ति मुझे प्रेमपूर्वक गुड़ एवं चने की दाल का भोग लगाएगा उसकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होंगी.” तभी से सभी भक्त अपने आराध्य श्रीहरि विष्णु को गुड़ और चने की दाल का भोग लगाकर उनकी कृपा एवं आशीर्वाद प्राप्त करते हैं.


