शनिवार का दिन भगवान शनिदेव को समर्पित है। शनिदेव को हमारे शास्त्रों में कर्म देवता अथवा न्यायाधीश कहा जाता है जो मनुष्य को उसके कर्म के अनुसार फल देने के लिए जाने जाते हैं। कहते है जब व्यक्ति के जीवन में दुख आता है तो शनिदेव उससे नाराज होते है, और व्यक्ति शनिदेव की विशेष आराधना करता है भगवान शनिदेव की कृपा प्राप्त करने के लिए मनुष्य को सत्य, ईमानदारी और धर्म के मार्ग पर चलना अत्यंत आवश्यक है।

शनि देव अच्छे कर्मों का शुभ फल देते हैं और बुरे कर्म करने वालों का जीवन कष्टों से भर देते हैं. माना जाता है कि जो व्यक्ति शनिवार के शनि की पूजा करता उस पर हमेशा शनि की विशेष कृपा बनी रहती है  शास्त्रों के जानकारों का कहना है कि शनि देव की पूजा का सही समय सूर्यास्त के बाद संध्याकाल में होता है. शाम के समय शनि देव की विधिवत पूजा-अर्चना करने से जीवन में सुख-संपन्नता बनी रहती है और कभी कोई दुख नहीं आता है. लेकिन क्या आप को पता है कि शनिदेव और उनके पिता सूर्यदेव के बीच कभी नहीं बनी। उनका आपस में 36 का आंकड़ा रहा है। इसकी एक पौराणिक कथा है जो आज आप भी जानिए।

पौराणिक कथा

शनिदेव की माता का नाम छाया और पिता ग्रहों के राजा सूर्य देव हैं. शनिदेव की बहन का नाम भद्रा है. शनिदेव के सौतेले भाई यमराज और सौतेली बहन यमुना हैं. इनको यम और यमी के नाम से भी जानते हैं। पौराणिक कथा के अनुसार, शनिदेव का जन्म हुआ तो वे काले रंग के और कमजोर से थे. सूर्यदेव को जब पता चला कि वे पिता बने हैं, तो वे मिलने के लिए पहुंचे. सूर्यदेव ने जब शनिदेव को देखा तो खुश नहीं हुए. उनके मन में यह शंका हुई कि उनका रंग गोरा है तो उनका पुत्र काला कैसे हो गया? इस वजह से वे शनिदेव की माता छाया के चरित्र पर शक करने लगे. इसे छाया काफी दुखी हुईं और शनिदेव से भेदभाव करने के लिए सूर्य देव को कुष्ठ रोग का श्राप दे दिया.

शनिदेव जब गर्भ में थे, तक माता छाया ने भगवान शिव की कठोर तपस्या की थी. कठोर तपस्या की  वज​ह से वह कमजोर और काली पड़ गई थीं. उसका प्रभाव शनिदेव पर भी पड़ा, जिससे उनका रंग काला हो गया.

 

जब शनिदेव को इस बात का पता चला तो वे ​अपने पिता पर क्रोधित हो गए. उन्होंने भगवान शिव की कठोर तपस्या कि ताकि वे अपने पिता को माता के प्रति गलत व्यवहार के लिए दंडित कर सकें. भगवान शिव जब प्रसन्न हुए तो उन्होंने शनिदेव को नक्षत्र मंडल में स्थान देकर दंडाधिकारी बना दिया. सूर्य देव के इस व्यवहार के कारण ही पिता और पुत्र में नहीं बनती है. तभी से शनिदेव और सूर्य देव में 36 का आंकड़ा है.

 

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