चंडीगढ़, 21 जुलाई: 11 जुलाई 2006 की वो भयावह शाम, जब मुंबई की ज़िंदगी की रफ्तार थम गई थी — सात लोकल ट्रेनों में सिलसिलेवार बम धमाकों ने न केवल 189 लोगों की जान ले ली थी, बल्कि सैकड़ों परिवारों की ज़िंदगी को भी बिखेर दिया था। उस दर्दनाक हादसे के लगभग 19 साल बाद, बॉम्बे हाईकोर्ट ने इस मामले में एक बड़ा और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है।
अदालत ने सभी 12 दोषियों को बरी कर दिया है, जिन्हें सालों पहले इस मामले में दोषी ठहराया गया था और जिनमें से पांच को मृत्युदंड तथा सात को आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई गई थी।
कोर्ट ने क्या कहा? — ‘संदेह का लाभ’ देकर सभी आरोपी रिहा
लंबी कानूनी प्रक्रिया और गहराई से जांच के बाद, बॉम्बे हाईकोर्ट की खंडपीठ ने माना कि प्रस्तुत साक्ष्य कमजोर थे, और उनमें किसी भी आरोपी के खिलाफ पर्याप्त ठोस सबूत नहीं थे।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि “संदेह के लाभ” (Benefit of Doubt) का सिद्धांत न्यायिक प्रक्रिया का मूल आधार है और जब तक किसी पर अपराध साबित न हो जाए, उसे दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
इस आधार पर, अदालत ने सभी आरोपियों को निर्दोष घोषित करते हुए तत्काल रिहा करने के आदेश दिए।
फैसले से पहले क्या था आरोपियों का हाल?
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5 आरोपी: मृत्युदंड की सज़ा पाए थे।
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7 आरोपी: उम्रकैद की सज़ा भुगत रहे थे।
इन सभी ने लगभग 17 से 18 साल जेल में बिताए, जिसमें अपील की लंबी प्रक्रिया और कानूनी लड़ाई शामिल थी।
आज का फैसला इन लोगों और उनके परिवारों के लिए एक बड़ी राहत और न्याय की उम्मीद लेकर आया है।
क्या हुआ था 11 जुलाई 2006 को?
मुंबई की लोकल ट्रेनें उस दिन भी रोज़ की तरह लोगों को उनके घर पहुंचाने में व्यस्त थीं, जब शाम करीब 6:24 से 6:35 बजे के बीच पश्चिम रेलवे की 7 ट्रेनों में एक के बाद एक धमाके हुए।
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धमाके प्रेशर कुकर बमों से किए गए थे।
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हमले Virar, Borivali, Bhayandar, Jogeshwari, Khar, Matunga Road और Mahim स्टेशनों के बीच हुए थे।
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इन धमाकों में 189 लोग मारे गए और 827 से ज्यादा घायल हुए थे।
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यह हमला इंडियन मुजाहिद्दीन और पाकिस्तान स्थित आतंकियों से जोड़ा गया था।
मामले की जांच और विवाद
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ATS (Anti-Terrorism Squad) ने 2006 में 13 लोगों को आरोपी बनाया।
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बाद में NIA और अन्य एजेंसियों ने जांच में अलग-अलग दृष्टिकोण प्रस्तुत किए।
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कई मानवाधिकार संगठनों और वकीलों ने दावा किया कि आरोपियों को झूठे सबूतों के आधार पर फंसाया गया।
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ट्रायल कोर्ट ने 2015 में दोषी ठहराया था, लेकिन अब हाईकोर्ट ने इस फैसले को पलट दिया।
अब सवाल उठते हैं:
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क्या असली गुनहगार अब भी खुले घूम रहे हैं?
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जिन लोगों ने लगभग दो दशक जेल में बिताए, उन्हें न्याय में हुई देरी की भरपाई कैसे मिलेगी?
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इस फैसले से 2006 के पीड़ित परिवारों की भावनाओं पर क्या असर पड़ेगा?


