देवो में देव महादेव को सोमवार का देवता कहा जाता है, सोमवार को विशेष पूजा का विधान माना जाता है, भगवान शिव को सृष्टि के संहारक के रूप में पूजा जाता है लेकिन वे केवल विनाश के देवता ही नहीं बल्कि सृष्टि, पालन और संहार तीनों के अधिपति हैं। वे समय से परे हैं और समय के भी स्वामी हैं, इसलिए उन्हें ‘महाकाल’ कहा जाता है।
काल के अधिपति है भगवान शिव
शिव समय (काल) के भी स्वामी हैं। उनका कोई आदि और अंत नहीं है, वे स्वयं स्वयंभू हैं और समय की सीमाओं से परे हैं, इसलिए उन्हें ‘कालों के भी काल’ कहा जाता है।
महाकाल का अर्थ है – ‘महान काल’ यानी वह जो स्वयं समय से भी परे हो, जो जन्म और मृत्यु की सीमाओं में न बंधा हो। शिव का यह स्वरूप न केवल उनकी शक्ति को दर्शाता है, बल्कि यह भी बताता है कि वे ही ब्रह्मांड के वास्तविक शासक हैं।

भगवान महाकाल का प्राकट्य कब हुआ
भगवान महाकाल का उल्लेख शिव पुराण और स्कंद पुराण में मिलता है। पुराणों में एक कथा मिलती है कि उज्जैन में एक बार दुष्ट असुर ‘दूषण’ का अत्याचार बढ़ गया था। उसने वहां के लोगों को धर्म से विमुख करने की चेष्टा की और ऋषि-मुनियों पर अत्याचार किया। भक्तों की पीड़ा को देखकर भगवान शिव ने क्रोध में अपने महाकाल स्वरूप को धारण किया। यह स्वरूप इतना प्रचंड था कि दुष्ट दूषण और उसके साथी महादेव के इस विकराल रूप को देखकर भयभीत हो गए। भगवान शिव ने अपने तांडव और तीसरे नेत्र की अग्नि से दूषण का अंत कर दिया।

रुद्राभिषेक का महत्व और विधि
भगवान शिव की दैनिक पूजा के साथ ही रुद्राभिषेक का बड़ा महत्व है जिससे प्रभु शिव शीघ्र प्रसन्न हो जाए है तो जानते है रुद्राभिषेक की विधि
सबसे पहले जब आपको रुद्राभिषेक करवाना हो तो उस दिन सुबह जल्दी उठे, जल्दी ही स्नान करें शुद्ध और साफ कपड़ें पहने। मंदिर या घर में जहां पर आपको करना है सबसे पहले भगवान शिव की प्रतिमा रखें फिर शिवलिंग पर शुद्ध जल के साथ गंगाजल चढ़ाएं। पंजामृत बनाएं जिसके लिए दूध, दही, घी, शक्कर, गंगाजल डाल कर पंचामृत बनाएं। भगवान शिव को यह पंचामृत चढ़ाए फिर बेलपत्र, फूल, फल अर्पित करें. इसके बाद महामृत्युंजय मंत्र,रुद्राष्टक, शिव चालीसा का विधि पूर्वक पाठ करें दीपक जला कर भगवान शिव की आरती करें और फिर सभी में प्रसाद अर्पित करें । वैसे आप ब्राह्मण को बुला कर भी रुद्राभिषेक कर सकते है क्योंकि इसमें मत्रों का भी जाप होता है लेकिन भगवान शिव श्रद्दा देखते है वो आपके किये पूजा को जरुर स्वीकार करेंगे। रुद्राभिषेक किसी खास मनोकामना की पूर्ति के लिए किया जाता है इसके साथ ही कई चीजों से रुद्राभिषेक किया जाता है।
विशेष अवसर पर या सोमवार, प्रदोष और शिवरात्रि आदि पर्व के दिनों में मंत्र, गोदुग्ध या अन्य दूध मिलाकर अथवा केवल दूध से भी अभिषेक किया जाता है। विशेष पूजा में दूध, दही, घृत, शहद और चीनी से अलग-अलग अथवा सबको मिलाकर पंचामृत से भी अभिषेक किया जाता है। तंत्रों में रोग निवारण हेतु अन्य विभिन्न वस्तुओं से भी अभिषेक करने का विधान है। इस प्रकार विविध द्रव्यों से शिवलिंग का विधिवत अभिषेक करने पर अभीष्ट कामना की पूर्ति होती है।
रुद्राभिषेक के विभिन्न पूजन के लाभ इस प्रकार हैं
जल से अभिषेक करने पर वर्षा होती है।
असाध्य रोगों को शांत करने के लिए कुशोदक से रुद्राभिषेक करें।
भवन-वाहन के लिए दही से रुद्राभिषेक करें।
लक्ष्मी प्राप्ति के लिए गन्ने के रस से रुद्राभिषेक करें।
धनवृद्धि के लिए शहद एवं घी से अभिषेक करें।
तीर्थ के जल से अभिषेक करने पर मोक्ष की प्राप्ति होती है।
इत्र मिले जल से अभिषेक करने से बीमारी नष्ट होती है।
पुत्र प्राप्ति के लिए दुग्ध से और यदि संतान उत्पन्न होकर मृ/त पैदा हो तो गोदुग्ध से रुद्राभिषेक करें।
गोदुग्ध से साथ शुद्ध घी से आरोग्यता मिलती है
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