श्रद्धा और भक्ति से बदलता भाग्य..जानिएं वैभव लक्ष्मी व्रत की कथा

माता लक्ष्मी व्रत की कहानी – एक बड़ा शहर था | इस शहर में बहुत लोग रहते थे | सब अपने – अपने काम में व्यस्त रहते हैं | किसी को किसी की परवाह नहीं |घर के सदस्यों को भी एक दुसरे की परवाह नही होती | भजन – कीर्तन , भक्ति – भाव , दया – माया परोपकार जैसे संस्कार कम हो गये | इतनी बुराईयों के बाद शहर में कुछ अच्छे लोग भी रहते थे |

ऐसे अच्छे लोगों में शीला और उसके पति की गृहस्थी मानी जाती थी | शीला धार्मिक प्रकृति की और सन्तोषी थी |उसका पति भी विवेकी था। वो दोनो प्रभु भजन में अच्छी तरह समय व्यतीत कर रहे थे

शीला की गृहस्थी इसी तरह ख़ुशी – ख़ुशी चल रही थी | पर इंसान का नसीब पल भर में राजा को रंक बना देता हैं और रंक को राजा |

शीला के पति के अगले जन्म के कर्म भोगने बाकि रह गये होंगे की वह बुरे लोगो से दौस्ती कर बैठा | वह गलत रास्ते पर चढ़ गया और रास्ते के भिखारी के समान उसकी हालत हो गई  थी | दोस्तो के साथ उसे भी शराब की आदत हो गई | जुआ भी खेलने लगा | इस तरह बचाई हुई धन राशी जुए में हर गया था |

शीला सुशील और संस्कारी स्त्री थी | उसको पति के बर्ताव से बहुत दुःख हुआ | कहा जाता है, सुख़ के पीछे दुःख और दुःख के पीछे सुख़ आता ही हैं | इसलिये दुख़ के पीछे सुख़ आएगा ही , इसी श्रद्दा के साथ शीला प्रभु कीर्तन में लीन रहने लगी | एक दिन दोपहर को उनके द्वार पर किसी ने दस्तक दी |

शीला सोच में पड गई की मुझ जैसे गरीब के घर इस वक्त कौन आया होगा ? फिर भी द्वार पर आये हुए अतिथि को आदर करना चाहिये शीला ने द्वार खोला |

देखा तो सामने एक माँ जी खड़ी थी | उसके चहरे पर अलौकिक तेज निखर रहा था |उनकी आँखों में मानो अमृत था | उनका भव्य चेहरा करुणा और प्यार से छलकता था |शीला माँ जी को आदर से घर ले आई उनको बिठाया |

माँ जी ने कहा, क्यों शीला ! मुझे पहचाना नहीं ?

माँ जी ने कहा: ‘ क्यों शीला ! मुझे पहचाना नहीं ?‘ क्यों भूल गई ? हर शुक्रवार को लक्ष्मी जी के मन्दिर में भजन कीर्तन होते हैं , तब मैं भी वहा आती हूँ | वहाँ हर शुक्रवार हम मिलते हैं | ‘लेकिन शीला दुःख के मारे लक्ष्मीजी के मन्दिर भी नहीं जाती थी | शीला के आँखों में आंसू आ गये |यह देख कर मांजी शीला के नजदीक और उसकी सिसकती पीठ पर प्यार भरा हाथ रख कर सांत्वना दी| शीला ने अपना सारा हाल मांजी से कह दिया।

यह सुन मांजी ने कहा अब तुम्हारे सुख़ के दिन अवश्य आयेंगे | तू धेर्य रख के माँ लक्ष्मी जी का व्रत कर | इससे सब ठीक हो जायेगा | ‘

तब शीला ने लक्ष्मी जी का व्रत कैसे किया जाता हैं ,पूछा, माँ जी ने कहा , बेटी ! माँ लक्ष्मी का व्रत बहुत सरल हैं | इसे ‘ वरलक्ष्मी व्रत ‘ या  ‘वैभव लक्ष्मी  ‘ कहा जाता हैं | यह व्रत करने वालो की सब मनोकामना पूर्ण होती हैं |वह सुख़ सम्पत्ति और यश प्राप्त करता हैं | ऐसा कहकर मांजी ‘ वैभव लक्ष्मी व्रत ‘ की विधि कहने लगी |

दूसरे दिन शुक्रवार था. सबेरे स्नान करके स्वच्छ कपड़े पहनकर शीला ने मांजी द्वारा बताई विधि से पूरे मन से व्रत किया. शीला ने पूर्ण श्रद्धा-भक्ति से इक्कीस शुक्रवार तक ‘वैभवलक्ष्मी व्रत’ किया. इक्कीसवें शुक्रवार को उद्यापन विधि कर के सात स्त्रियों को ‘वैभवलक्ष्मी व्रत’ की सात पुस्तकें उपहार में दीं. फिर माताजी के ‘धनलक्ष्मी स्वरूप’ की छबि को वंदन करके भाव से मन ही मन प्रार्थना करने लगीं- ‘हे मां धनलक्ष्मी! मैंने आपका ‘वैभवलक्ष्मी व्रत’ करने की मन्नत मानी थी, वह व्रत आज पूर्ण किया है.

हे मां! मेरी हर विपत्ति दूर करो.. हमारा सबका कल्याण करो. जिसे संतान न हो, उसे संतान देना. सौभाग्यवती स्त्री का सौभाग्य अखंड रखना. कुंआरी लड़की को मनभावन पति देना. जो आपका यह चमत्कारी वैभवलक्ष्मी व्रत करे, उनकी सब विपत्ति दूर करना. सभी को सुखी करना. हे माँ! आपकी महिमा अपार है.’ ऐसा बोलकर लक्ष्मीजी के ‘धनलक्ष्मी स्वरूप’ को प्रणाम किया। इस तरह शीला ने लक्ष्मी पूजा से अपना भाग्य बदल लिया ।