चंडीगढ़, 20 जून: सनातन धर्म में एकादशी तिथियों का विशेष महत्त्व है। उनमें भी आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी, जिसे योगिनी एकादशी कहा जाता है, अत्यंत पुण्यदायिनी मानी जाती है। धर्मशास्त्रों में कहा गया है कि इस एकादशी का व्रत करने से 88 ब्राह्मणों को भोजन कराने के बराबर फल मिलता है।
व्रत का आध्यात्मिक प्रभाव
इस दिन श्रद्धा और नियमपूर्वक व्रत करने से व्यक्ति के पूर्व जन्मों के पाप, इस जन्म की गलतियां, और किसी के श्राप से उत्पन्न कष्ट सब नष्ट हो जाते हैं। इस व्रत को करने से चर्म रोग, मानसिक अशांति और जीवन की अनेक जटिल समस्याओं से भी छुटकारा मिलता है।
यह व्रत केवल उपवास नहीं, बल्कि इन्द्रियों को संयमित कर उन्हें भगवान की सेवा में लगाना है। यही सच्चा आत्मनियमन और भक्ति का मार्ग है।
रात्रि जागरण और संकीर्तन का महत्त्व
स्कन्दपुराण के अनुसार, इस दिन रातभर जागकर भगवान विष्णु के नाम का कीर्तन, ध्यान और वैष्णव ग्रंथों का पाठ करने से जन्म-जन्मांतर के पाप भी मिट जाते हैं।
रात्रि में दीपदान, भजन, और प्रभु के नाम का संकीर्तन करना, जीवन में आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार करता है।
पूजन-विधि और आचरण
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व्रत के दिन प्रातःकाल स्नान करके भगवान विष्णु का पूजन करें।
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धूप, दीप, नेवैद्य, पुष्प व फलों से पूजा करें।
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दिनभर अन्न न लें; केवल फलाहार करें।
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भूखों को अन्न, प्यासों को जल देना इस दिन अत्यंत पुण्यकारी होता है।
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रात्रि में जागरण कर प्रभु नाम संकीर्तन करें।
अंत में, द्वादशी तिथि को सूर्योदय के बाद विधिपूर्वक ब्राह्मणों को दान देकर व्रत का पारण करें। यही एकादशी व्रत की पूर्णता है।
योगिनी एकादशी व्रत कथा (पद्मपुराण से)
बहुत पुरानी बात है, स्वर्गलोक में अलकापुरी नामक नगरी थी, जहां यक्षों के राजा कुबेर का शासन था। कुबेर भगवान शिव के अनन्य भक्त थे और प्रतिदिन भगवान शिव को पुष्प अर्पित करते थे।
उनके लिए फूल लाने का कार्य एक यक्ष माली करता था, जिसका नाम था हेम माली। वह प्रतिदिन मानसरोवर से सुंदर फूल चुनकर अर्धरात्रि में राजा के पास लाया करता था।
एक दिन, हेम माली पुष्प तो ले आया लेकिन अपनी सुंदर पत्नी विशालाक्षी के मोह में पड़कर घर पर ही रुक गया और राज-दरबार में पुष्प पहुंचाना भूल गया।
राजा कुबेर जब पूजा के समय फूल न मिलने से अत्यंत दुखी हुए, तब उन्होंने क्रोधित होकर हेम माली को शाप दिया – “तू अपने कर्म से विमुख हुआ है, अतः अब रोगों से ग्रस्त होकर पृथ्वी पर जाएगा।”
हेम माली शापवश धरती पर गिर गया, उसका शरीर अनेक प्रकार के चर्म रोगों से पीड़ित हो गया, और वह अत्यंत दुःख भोगता रहा।
एक दिन वह ऋषि मार्कण्डेय के आश्रम में पहुंचा और अपनी सारी व्यथा बताई। ऋषि ने उसे योगिनी एकादशी का व्रत करने की सलाह दी।
हेम माली ने श्रद्धा और नियमपूर्वक यह व्रत किया। फलस्वरूप वह न केवल अपने रोगों से मुक्त हुआ, बल्कि पूर्व जन्म के पाप और शाप से भी छुटकारा पाकर स्वर्ग को प्राप्त हुआ।
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