27 अगस्त को देश भर में गणेश चतुर्थी का त्योहार मनाया जायेगा, गणेश चतुर्थी भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाया जाता है। इस दिन भक्त भगवान गणेश की मूर्ति को शुभ मुहूर्त में स्थापित करते हैं और विधि-विधान से उनकी पूजा करते हैं,ऐसा करने से बेहद शुभ फल की प्राप्ति होती है। मान्यता है की विधि पूर्वक और नियमों का ध्यान रखते हुए भगवान गणेश की प्रतिमा को घर में स्थापित करना बहुत शुभ माना जाता है। ऐसा करने से जातक को गणपतिजी की विशेष कृपा प्राप्त हो सकती है और घर में सुख-समृद्धि आती है, भगवान गणेशजी की मूर्ति स्थापित करने का समय -भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि पर मध्याह्न में भगवान गणेश का जन्म हुआ था। ऐसे में दोपहर के समय ही अभिजीत मुहूर्त में उनकी मूर्ति स्थापित करना शुभ माना जाता है। उदया तिथि को देखते हुए गणेश चतुर्थी का त्योहार 27 अगस्त को मनाया जाएगा, इसी दिन गणपति की स्थापना की जाएगी, वैदिक कैलेंडर के तहत 27 अगस्त को सुबह 11.00 बजे से दोपहर 1.30 बजे तक गणेश की स्थापना का अभिजित मुहूर्त है, इस दौरान भगवान गणेश की मूर्ति को स्थापित करना सबसे शुभ माना जाता है, 27 अगस्त को सूर्योदय से पहले स्नान करके भगवान गणेश के सामने व्रत का संकल्प लेकर व्रत करें। इससे गणेश चतुर्थी व्रत का फल कई गुना बढ़ जाएगा। परिवार में खुशियां आने लगती है। सभी कष्ट दूर हो जाते हैं।
गणेश चतुर्थी पर पूजा कैसे करें- गणेश चतुर्थी पर कुछ खास बातों का ध्यान रखना बेहद जरुरी होता है, इस दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान- ध्यान करें और पूजा स्थल की अच्छे से सफाई करें, इसके बाद ईशान कोण में चौकी पर पीला या लाल कपड़ा बिछा कर भगवान गणेश को विराजमान करें, आप भगवान गणेश को फल,फूल, मेवा, दुर्वा चढाये, और साथ में अगरबत्ती धूप से भगवान गणेश की पूजा करें और आरती करें.
गणेश चतुर्थी की कहानी- एक बार महादेवजी स्नान करने के लिए भोगावती गए। उनके जाने के पश्चात पार्वती ने एक पुतला बनाया और उसका नाम ‘गणेश’ रखा। पार्वती ने उससे कहा- हे पुत्र! तुम एक मुगदल लेकर द्वार पर बैठ जाओ। मैं भीतर जाकर स्नान कर रही हूँ। जब तक मैं स्नान न कर लूं, तब तक तुम किसी भी पुरुष को भीतर मत आने देना। भोगावती में स्नान करने के बाद जब भगवान शिवजी आए तो गणेश जी ने उन्हें द्वार पर रोक लिया। इसे शिवजी ने अपना अपमान समझा और क्रोधित होकर उनका सिर धड़ से अलग करके भीतर चले गए। पार्वती ने उन्हें नाराज देखकर समझा कि भोजन में विलंब होने के कारण महादेवजी नाराज हैं। इसलिए उन्होंने तत्काल दो थालियों में भोजन परोसकर शिवजी को बुलाया। तब दूसरा थाल देखकर तनिक आश्चर्यचकित होकर शिवजी ने पूछा- यह दूसरा थाल किसके लिए हैं? पार्वती जी बोलीं- पुत्र गणेश के लिए हैं, जो बाहर द्वार पर पहरा दे रहा है। यह सुनकर शिवजी और अधिक आश्चर्यचकित हुए। तुम्हारा पुत्र पहरा दे रहा है? हाँ नाथ! क्या आपने उसे देखा नहीं? देखा तो था, किन्तु मैंने तो अपने रोके जाने पर उसका सिर काट दिया। यह सुनकर पार्वती जी बहुत दुःखी हुईं। वे विलाप करने लगीं। तब पार्वती जी को प्रसन्न करने के लिए भगवान शिव ने एक हाथी के बच्चे का सिर काटकर बालक के धड़ से जोड़ दिया। पार्वती जी इस प्रकार पुत्र गणेश को पाकर बहुत प्रसन्न हुई और फिर पति तथा पुत्र को भोजन कराकर बाद में स्वयं भोजन किया। ये घटना भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को हुई थी। इसीलिए यह तिथि पुण्य पर्व के रूप में मनाई जाती है, रिपोर्ट न्यूज पीडिया 24
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