चंडीगढ़, 1 जुलाई: अमेरिका की विदेश नीति में मानवीय सहायता को लेकर हालिया बदलाव पूरी दुनिया के लिए एक नई चिंता लेकर आए हैं। Donald Trump के नेतृत्व में अमेरिकी सरकार द्वारा विदेशी मानवीय सहायता (Foreign Humanitarian Aid) में की गई कट्टर कटौती ने कई विकासशील देशों में ज़िंदगी और मौत के बीच की दूरी को और बढ़ा दिया है।
एक नई रिपोर्ट, जो कि प्रतिष्ठित मेडिकल जर्नल The Lancet में प्रकाशित हुई है, एक बेहद चौंकाने वाला दावा करती है। रिपोर्ट के अनुसार, अगर अमेरिका ने विदेशी सहायता में की गई कटौती को बरकरार रखा, तो साल 2030 तक लगभग 1.4 करोड़ अतिरिक्त मौतें हो सकती हैं।
छोटे बच्चों के लिए सबसे बड़ा खतरा
इस अनुमान में सबसे दुखद पहलू यह है कि इन मौतों में से लगभग 45 लाख मौतें 5 साल से कम उम्र के बच्चों की हो सकती हैं। यानी हर साल करीब 7 लाख छोटे बच्चे सिर्फ इसलिए अपनी जान गंवा सकते हैं क्योंकि दुनिया की सबसे बड़ी ताकत ने ज़रूरतमंद देशों को सहायता देना बंद कर दिया।
यह आँकड़ा सिर्फ एक संख्या नहीं, बल्कि उन परिवारों की त्रासदी है जो अपने बच्चों को पोषण, दवाइयां और सुरक्षित जीवन देने में असमर्थ हो जाएंगे।
USAID की योजनाएं लगभग बंद, गरीब देशों पर कहर
ट्रंप प्रशासन द्वारा अमेरिकी विकास सहायता एजेंसी (USAID) की 80% से अधिक योजनाएं बंद कर दी गई हैं। इसका सबसे ज़्यादा असर अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका के उन देशों पर पड़ा है जो पहले से ही आर्थिक और स्वास्थ्य संसाधनों की गंभीर कमी से जूझ रहे हैं।
इन देशों में अब टीकाकरण, पोषण, आपातकालीन चिकित्सा और बच्चों की देखभाल से जुड़ी योजनाएं या तो ठप हो चुकी हैं या न्यूनतम स्तर पर पहुंच गई हैं। यह कटौती सीधे तौर पर जीवन और मृत्यु के बीच की रेखा को मिटा रही है।
डॉक्टर्स और विशेषज्ञों की चेतावनी
रिपोर्ट के सह-लेखक और ग्लोबल हेल्थ विशेषज्ञ डॉ. डेविड रासेला ने कहा है,
“अंतरराष्ट्रीय सहायता में इतनी बड़ी कटौती का असर एक महामारी या युद्ध जैसी तबाही के बराबर है। इससे पिछले 20 वर्षों की तरक्की एक ही झटके में नष्ट हो सकती है।”
उनके अनुसार, यह सिर्फ आर्थिक नीति नहीं है, बल्कि यह नीति करोड़ों लोगों के जीवन को सीधे तौर पर प्रभावित कर रही है।
भूख और कुपोषण से कराहते बच्चे
जहां कहीं भी अमेरिकी सहायता की निर्भरता थी, वहाँ हालात अब बद से बदतर हो गए हैं। केन्या के काकुमा शरणार्थी शिविर में बच्चों की हालत इतनी भयावह हो गई है कि कई बच्चे भूख के कारण चलने-फिरने तक की ताकत खो बैठे हैं।
एक रिपोर्ट में एक बच्ची का ज़िक्र किया गया है जिसकी हालत इतनी खराब थी कि उसकी त्वचा तक झड़ने लगी थी — यह भूख और कुपोषण का सबसे वीभत्स रूप है।
संयुक्त राष्ट्र की सख्त चेतावनी
संयुक्त राष्ट्र (UN) ने भी अमेरिका की इस विदेश नीति पर गहरी चिंता जताई है। उनके अनुसार यह सिर्फ नीति नहीं, बल्कि एक “गंभीर मानवीय आपदा” का संकेत है। लाखों लोगों की जानें अब खतरे में हैं — और यह सिर्फ कुछ देशों की नहीं, बल्कि पूरी मानवता की चुनौती बन चुकी है।
क्या यह संकट रोका जा सकता है?
रिपोर्ट यह भी संकेत देती है कि यदि अमेरिका अपनी नीतियों में बदलाव लाता है और विदेशी सहायता को फिर से सक्रिय करता है, तो यह संभावित आपदा को रोका जा सकता है। लेकिन यदि यही स्थिति जारी रही, तो आने वाले वर्षों में दुनिया को मानव इतिहास की सबसे बड़ी मानवीय त्रासदियों में से एक का सामना करना पड़ सकता है।
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