नहाय-खाय से शुरू हुआ छठ पर्व: जाने पहली बार कैसे करें पूजा!

आज नहाए -खाए से छठ महापर्व की शुरुआत हो चुकी है. चार दिनों तक चलने वाले इस पर्व में छठी मैया और सूर्य देवता की पूजा की जाती है.

ऐसा विश्वास है कि छठी मैया की पूजा से संतान सुख, आरोग्य और समृद्धि प्राप्त होती है.

छठ पूजा का यह चार दिवसीय पर्व 28 अक्तूबर यानी मंगलवार को ऊषा अर्घ्य के साथ संपन्न होगा.

छठ पूजा न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि यह सूर्य देव की उपासना, प्रकृति के प्रति आभार और मानव के आत्मसंयम का अद्भुत उदाहरण भी है.

बिहार, झारखंड के अलावा पूर्वी उत्तर प्रदेश में यह पर्व धूमधाम से मनाया जाता है. इस महापर्व में महिलाएं और पुरुष शामिल होते हैं.

पहली बार छठ पूजा शुरू करने जा रहे हैं ?

जो पहली बार छठ पूजा शुरू करने जा रहे हैं. उनके मन में कई सवाल होते है कि वह कैसे अपनी पूजा कर सकें?

क्या तैयारी करते है कही कोई गलती ना हो। तो ऐसे में माना जाता है

अविवाहित महिला पुरुष या कोई भी व्यक्ति संकल्प के साथ इस अनुष्ठान में भाग ले सकता है.

छठ पूजा एक ऐसी पूजा होती है जिसमें फल पहले मिलता है और उसके बाद अनुष्ठान को पूरा किया जाता है.

हमारे शास्त्रों में वर्णित है कि जो भी व्यक्ति छठ पूजा करना चाहते हैं वह कोई संकल्प लेते हैं

परिवार के वरिष्ठों से अनुमति लेकर व्रत शुरू करें

छठ करने से पूर्व अपनी परिवार के वरिष्ठों से अनुमति लेकर व्रत शुरू करनी चाहिए और

व्यक्ति को पहले से ही भगवान सूर्य को अर्घ्य देना शुरू कर देना चाहिए. माना जाता है यदि कोई छठ पर्व का संकल्प लेता है

तो वो एक महिनें पहले से ही भगवान सूर्य को अर्घ्य देना शुरू कर दे. इससे न सिर्फ उनका संकल्प मजबूत होगा, बल्कि मानसिक रूप से भी वो अपने आप को पहले से ही मजबूत कर लेते है.

इसके साथ ही माना जाता है कि यदि पहली बार व्यक्ति चाहे तो फल लेकर भगवान सूर्य का दर्शन करके इस व्रत को शुरू कर सकते हैं

दूसरे बार में सायंकालीन अर्घ्य देकर के व्रत की शुरुआत कर सकते हैं और तीसरी बार प्रातःसायं कालीन दोनों अर्घ्य दे सकते हैं.

यदि आप एक बार में पूजा कर पा रहे हैं तो आप शुरू से पूरी विधि विधान से छठ पूजा को कर सकते हैं

छठ महापर्व की शुरुआत नहाय खाय से होती है.

छठ की शुरुआत नहाए खाए से होती है. यह एक वैज्ञानिक दृष्टि का त्यौहार भी माना जाता है.

नहाए खाने में सबसे पहले महिलाएं जल तत्व का सेवन करती है. जिसके तहत वह जल से भरे हुए सब्जी का सेवन करते हैं.

व्रती प्रातः काल गंगा, नदी, तालाब या किसी पवित्र जलाशय में स्नान करते हैं. स्नान के बाद व्रती शुद्ध, सादा और साफ वस्त्र पहनते हैं.

स्नान के बाद रसोई और पूजा स्थल को साफ किया जाता है. माना जाता है कि छठी मैया स्वच्छता और पवित्रता की प्रतीक हैं,

इसलिए किसी भी तरह की अशुद्धि नहीं होनी चाहिए. इस दिन व्रती एक बार ही भोजन करते हैं, जिसे “नहाय-खाय का प्रसाद” कहा जाता है.

खाना कांसे या पीतल के बर्तन में और मिट्टी के चूल्हे पर बनाया जाता है. खाना बनाने में आम की लकड़ी या गोबर के उपले का उपयोग किया जाता है

क्योंकि इन्हें सात्विक और शुद्ध माना जाता है. परंपरा है भोजन में आमतौर पर कद्दू की सब्जी, चने की दाल और सादा चावल बनाया जाता है.  नहाय-खाय के दिन ही व्रती छठ व्रत का संकल्प लेते हैं।

 

दूसरे दिन होता है खरना

दूसरे दिन खरना के समय चावल और गुड़ का सेवन किया जाता है क्योकि गुड़ एक अग्नि तत्व होता है

और उसके बाद फिर तीसरे दिन निर्जल उपवास रखकर जल तत्व का सेवन करते हैं.

चौथे दिन भोर में अर्घ्य के दौरान वह वायु तत्व का अनुसरण करती है.

इस प्रकार पांच तत्व के साथ महिलाएं इस व्रत को करती हैं.