गुरु तेग बहादुर जी—त्याग, तपस्या और बलिदान की मिसाल

सिखों के 9वें गुरु गुरु तेग बहादुर जी जिन्होंने ना किसी धर्म में दखल दिया ना किसी से बदला चाहा बस इंसान की आजादी की खातिर अपनी शीश की कुर्बानी दे दी। इनकी यह  शहादत ना केवल सिख समुदाय की बल्कि पूरे भारतीय इतिहास की सबसे रोशन मिसाल बन गई।  हर वर्ष 24 नवंबर को गुरु तेग बहादुर का शहीदी दिवस मनाया जाता है, ताकि लोग उनके द्वारा किए गए सर्वोच्च त्याग को याद रख सकें.  सिख धर्म में गुरु तेग बहादुर जी का नाम बड़े आदर और सम्मान के साथ लिया जाता है क्योंकि उन्होंने मुगलों के अत्याचार से पीड़ित हिंदू समाज को बचाने के लिए अपना सर्वस्व कुर्बान कर दिया था. हिंद की चादर कहलाने वाले जिस ‘सच्चे पातशाह’ गुरुतेग बहादुर ने अपना सिर कल/म कराना मंजूर किया लेकिन इस्लाम को स्वीकार नहीं किया आज उनका 350वां बलि/दान दिवस मनाया जा रहा है.

25 नवंबर को देश की राजधानी दिल्ली समेत अन्य राज्यों में छुट्टी की भी घोषणा की गई है। उन्हें निडरता, धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा, अद्वितीय आध्यात्मिक शक्ति और महान बलिदान के लिए जाना जाता है। गुरु तेग बहादुर को ‘हिंद की चादर’ भी कहा जाता है।

क्यों कहा जाता है हिंद की चादर‘ 

17वीं शताब्दी में मुगल सम्राट औरंगजेब ने कश्मीरी पंडितों पर जबरन इस्लाम धर्म अपनाने का दबाव बनाया जा रहा था, जिसका कश्मीरी पंडितों ने विरो/ध जताया गया। ऐसे में कश्मीरी पंडित गुरु तेग बहादुर से मिले। इस पर गुरु तेग बहादुर ने उनकी तरफ से खड़े होने का भरोसा दिलाया। गुरु तेग बहादुर ने धार्मिक स्वतंत्रता के सिद्धांत पर अडिग रहने की बात कही और जबरन इस्लाम धर्म अपनाने से मना कर दिया।

गुरु तेग बहादुर को ‘हिंद की चादर’ कहा जाता है क्योंकि उन्होंने मुगलों के जुल्मों-सितम के आगे घुटने नहीं टेके और अपने सिद्धांत पर अडिग रहते हुए भारत के आत्मसम्मान को बनाए रखा.  कश्मीरी पंडितों के विश्वास और अधिकारों की रक्षा के लिए जो उन्होंने बलि/दान दिया, उसके सम्मान में उन्हें ‘हिंद की चादर’ सम्मान से नवाजा गया. गुरु तेग हादुर ने लंबे समय तक बकाला में आध्यात्मिक साधना की और बाद में सिखों के 9वें गुरु बने.

गुरु तेग बहादुर का प्रारंभिक जीवन

सिखों के नौवें गुरु गुरु तेग बहादुर जी का जन्म 18 अप्रैल, 1621 को अमृतसर में हुआ था. उनके पिता का नाम गुरु हरगोबिंद साहिब और माता का नाम नानकी था. गुरु हरगोविंद सिंह ​सिखों के छठे गुरु थे. गुरु तेग बहादुर जी के बचपन का नाम त्यागमल था. मान्यता है कि महज 13 साल की अवस्था में जब उन्होंने मुगलों के खिलाफ लड़ने के लिए तलवार उठा ली तो उनके पिता ने उनका नाम बदलकर तेग बहादुर रख दिया था.

गुरु तेग बहादुर के उपदेश

 

गुरु तेग बहादुर जी ने बहुत से उपदेश दिये..जिनमें से एक उपदेश में गुरु तेग बहादुर का कहना था कि अपने अहंकार पर नियंत्रण रखने वाला व्यक्ति ही सच्ची मुक्ति का अनुभव करता है.

एक सज्जन व्यक्ति वह है जो अनजाने में किसी की भावनाओ को ठेस ना पहुंचाएं.

हार और जीत यह आपकी सोच पर ही निर्भर है, मान लो तो हार है ठान लो तो जीत है.