चंडीगढ़, 16 जुलाई: भारत में आधार कार्ड को एक सर्वव्यापक पहचान दस्तावेज़ के रूप में प्रचारित किया गया है। सरकारी सब्सिडी, बैंकिंग लेन-देन, राशन वितरण, यहां तक कि मतदाता पहचान तक — हर सेवा अब आधार से जुड़ी हुई है। लेकिन एक हालिया RTI (सूचना का अधिकार) के तहत मांगी गई जानकारी ने आधार प्रणाली की गंभीर खामियों और कार्यप्रणाली की सीमाओं को बेपर्दा कर दिया है।
सिर्फ 10% मृतकों के आधार कार्ड हुए निष्क्रिय – RTI से चौंकाने वाला खुलासा
UIDAI ने बताया कि 2009 से 2023 के बीच सिर्फ 1.15 करोड़ आधार नंबर मृत घोषित किए गए व्यक्तियों के कारण निष्क्रिय किए गए हैं।
लेकिन यही आंकड़ा अगर भारत की जनसंख्या रजिस्ट्रेशन प्रणाली (CRS) से तुलना करें, तो तस्वीर काफी अलग है। CRS के अनुसार, 2007 से 2019 तक देश में हर साल औसतन 83.5 लाख लोगों की मृत्यु हुई। इस हिसाब से पिछले 14 वर्षों में करीब 11.69 करोड़ मौतें हो चुकी हैं। यानी, UIDAI ने कुल मौतों के महज़ 10% मामलों में ही आधार कार्ड बंद किए हैं।
यह अंतर सिर्फ संख्या नहीं, बल्कि आधार डेटाबेस की विश्वसनीयता पर गहरा प्रश्नचिह्न है।
UIDAI ने खुद मानी ये सीमाएं:
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मृत व्यक्तियों की पहचान का कोई सक्रिय, स्वत: कार्यरत सिस्टम नहीं।
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साल-दर-साल कितने आधार बंद किए गए, इसका रिकॉर्ड भी नहीं रखा गया।
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UIDAI के अनुसार, वह आधार-विहीन लोगों की संख्या के अनुमान से भी अनभिज्ञ है।
बिहार में ‘100% से अधिक’ आधार कवरेज – आंकड़ों में विसंगति
RTI के माध्यम से जो आंकड़े सामने आए, उन्होंने एक और चौंकाने वाला सच उजागर किया:
| जिला | आधार कवरेज (%) |
|---|---|
| किशनगंज | 126% |
| कटिहार | 123% |
| अररिया | 123% |
| पूर्णिया | 121% |
| शेखपुरा | 118% |
एक जिले की जनसंख्या से अधिक आधार कार्ड जारी होना कैसे संभव है? इसके पीछे संभावित कारण हैं:
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मृतकों के कार्ड निष्क्रिय न होना
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जनसंख्या आंकड़ों में त्रुटि
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बड़े स्तर पर प्रवासन (Migration)
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डुप्लिकेट आधार पंजीकरण
आधार निष्क्रियता की प्रक्रिया में जटिलता
UIDAI के अनुसार, यदि Registrar General of India (RGI) किसी व्यक्ति के मृत्यु की जानकारी साझा करता है, तब UIDAI उस डेटा को अपने आधार डेटाबेस से मिलाकर निष्क्रियता प्रक्रिया शुरू करता है। यह प्रक्रिया भी कई शर्तों पर आधारित है:
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नाम में 90% मिलान
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लिंग में 100% समानता
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बायोमेट्रिक एक्टिविटी नहीं होनी चाहिए
अगर ये सब एक साथ लागू हों, तभी आधार निष्क्रिय होता है। लेकिन यही प्रक्रिया धीमी, अपूर्ण और असंगत साबित हो रही है।
इससे क्या खतरे हैं?
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सरकारी योजनाओं में लीकेज: मृत व्यक्तियों के नाम पर सब्सिडी या लाभ जारी हो सकते हैं।
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वोटिंग सिस्टम में गड़बड़ी: डुप्लिकेट या मृत आधार के जरिए वोटर आईडी से लिंकिंग में गड़बड़ी संभव।
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नीति निर्माण में भ्रम: फर्जी आंकड़े नीति योजनाओं की सटीकता को प्रभावित कर सकते हैं।
इस खुलासे से क्या साबित होता है?
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UIDAI के पास डेटा पारदर्शिता की कमी है।
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मृतकों के डेटा की पहचान और निष्क्रियता का कोई मजबूत, सक्रिय सिस्टम नहीं है।
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भारत जैसे विशाल देश में डिजिटल पहचान को सुरक्षित, सटीक और अद्यतन बनाए रखना अब और जरूरी हो गया है।
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