चंडीगढ़, 8 जुलाई: तमिलनाडु के कुड्डालोर जिले से आज सुबह एक ऐसी हृदय विदारक खबर सामने आई, जिसने हर किसी के दिल को झकझोर कर रख दिया। एक आम सुबह जब बच्चे स्कूल जाने के लिए तैयार होकर निकले थे, तब किसी ने सोचा भी नहीं था कि ये सुबह कुछ परिवारों के लिए ज़िंदगी का सबसे भयावह दिन बन जाएगी।
यह दर्दनाक हादसा कुड्डालोर और अलप्पक्कम के बीच स्थित एक मानवयुक्त रेलवे फाटक पर हुआ। जानकारी के अनुसार, एक स्कूल वैन, जिसमें कई बच्चे सवार थे, रेलवे क्रॉसिंग को पार करने की कोशिश कर रही थी, तभी वह एक तेज़ रफ्तार पैसेंजर ट्रेन की चपेट में आ गई। टक्कर इतनी जबरदस्त थी कि दो छात्रों की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि कम से कम छह अन्य बच्चे गंभीर रूप से घायल हो गए।
हादसा सुबह करीब 7:45 बजे हुआ, जब अधिकतर स्कूल वैनें बच्चों को उनके स्कूल पहुंचाने के लिए सड़कों पर होती हैं। प्रत्यक्षदर्शियों ने जो बताया वह और भी चौंकाने वाला था—उनका कहना है कि ट्रेन के आने के बावजूद रेलवे क्रॉसिंग का फाटक खुला हुआ था। यानी सुरक्षा की सबसे पहली और बुनियादी व्यवस्था ही नाकाम साबित हुई। इससे यह सवाल उठना लाज़मी है कि यदि यह क्रॉसिंग मानवयुक्त थी, तो उस समय वहां नियुक्त कर्मचारी कहां था?
एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने पुष्टि की कि इस भयावह टक्कर में दो बच्चों की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि अन्य घायलों को तत्काल पास के अस्पताल ले जाया गया, जहां उनका इलाज जारी है। मौके पर राहत व बचाव कार्य भी तुरंत शुरू किया गया।
रेलवे अधिकारियों ने इस बात की पुष्टि की है कि यह एक मानवयुक्त क्रॉसिंग थी, लेकिन गेट खुला रहना एक बहुत बड़ी चूक है, जिसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। अधिकारी ने यह भी कहा कि वह इस घटना की पूरी जानकारी जुटा रहे हैं और जल्द ही विस्तृत जानकारी सार्वजनिक की जाएगी। फिलहाल, रेलवे की लापरवाही और मानवीय भूल की संभावनाओं की जांच शुरू हो चुकी है।
इस घटना ने न सिर्फ उस इलाके के लोगों को, बल्कि पूरे राज्य और देश को भी गमगीन कर दिया है। बच्चों की जान जाना हर माता-पिता के लिए किसी दुःस्वप्न से कम नहीं होता। ग्रामीणों में भारी आक्रोश देखने को मिला है। वे इस तरह की क्रॉसिंग्स पर खासतौर से उन मार्गों पर जहाँ से स्कूल वाहन गुजरते हैं, सुरक्षा प्रबंधों की कड़ी जांच की मांग कर रहे हैं।
स्थानीय लोग यह जानना चाहते हैं कि आखिर एक मानवयुक्त फाटक कैसे खुला रह सकता है जब ट्रेन आने वाली हो? इस सवाल का जवाब सिर्फ जांच ही नहीं, बल्कि ईमानदार जवाबदेही से मिल सकता है।
यह घटना एक बार फिर हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हमारी सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था बच्चों की सुरक्षा के प्रति पर्याप्त सजग और सतर्क है? क्या हर रोज़ सड़कों पर निकलने वाले मासूमों की ज़िंदगी के लिए हमारे पास पुख्ता इंतज़ाम हैं?
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