रंगमंच की दुनिया को गहरा आघात: नहीं रहे महान नाट्य निर्देशक रतन थियम, 77 वर्ष की उम्र में ली अंतिम सांस!

चंडीगढ़, 23 जुलाई: भारतीय रंगमंच जगत में आज शोक की लहर दौड़ गई है। देश के सबसे प्रतिष्ठित और गहरे प्रभाव छोड़ने वाले नाट्यकारों में शामिल रतन थियम का 77 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। उनका अंतिम समय इम्फाल स्थित रीजनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज़ (RIMS) में बीता, जहां वे लंबे समय से बीमार चल रहे थे।

5 दशकों तक रंगमंच की आत्मा बने रहे रतन थियम

रतन थियम को भारतीय रंगमंच का ‘सृजनशील संत’ कहा जा सकता है। उन्होंने नाटकों को केवल मंचीय प्रस्तुति नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक और सामाजिक आंदोलन बना दिया। वे आधुनिक भारतीय थिएटर में ‘थिएटर ऑफ रूट्स’ आंदोलन के एक प्रमुख स्तंभ माने जाते हैं — एक ऐसा आंदोलन जिसने भारतीय संस्कृति, परंपरा और दर्शन को आधुनिक रंगमंच की भाषा में पिरोया।

एनएसडी के पूर्व निदेशक और संगीत नाटक अकादमी के उपाध्यक्ष

थियम ने 1987 से 1989 तक राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (NSD) के निदेशक के रूप में कार्य किया। यही नहीं, वे 2013 से 2017 तक NSD के अध्यक्ष भी रहे। इसके अलावा उन्होंने संगीत नाटक अकादमी के उपाध्यक्ष पद की जिम्मेदारी भी बखूबी निभाई।

उनका नेतृत्व केवल संगठनात्मक नहीं था, बल्कि उन्होंने संस्थानों को नाट्य-संवेदनाओं से समृद्ध किया। उनकी सोच, उनका मंचन और उनका लेखन रंगमंच के छात्रों के लिए मार्गदर्शन की तरह रहा।

सम्मान जो साबित करते हैं उनका अद्वितीय योगदान

रतन थियम को देश और विदेश में अनेकों पुरस्कार और सम्मान प्राप्त हुए। इनमें प्रमुख हैं:

  • 1987 – संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार (निर्देशन के लिए)

  • 1989 – भारत सरकार द्वारा पद्मश्री

  • 2012 – संगीत नाटक अकादमी की फेलोशिप (अधिष्ठाता सम्मान)

  • 1984 – इंडो-ग्रीक फ्रेंडशिप अवार्ड

  • 2008 – जॉन डी. रॉकफेलर अवार्ड (अमेरिका)

  • इसके अलावा उन्हें मेक्सिको, ग्रीस और जापान में भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई बार सम्मानित किया गया।

नाटकों की भाषा में समाज और आत्मा की गूंज

रतन थियम का लेखन और निर्देशन भारतीय दर्शन, युद्ध, करुणा और सत्य के पहलुओं को गहराई से छूता था। उनके चर्चित नाटकों में ‘चक्रव्यूह’, ‘उरूबंगम’, ‘आंधी’, ‘अंध युग’ जैसी प्रस्तुतियां शामिल हैं, जो आज भी थिएटर प्रेमियों के दिलों में जीवित हैं।

उनकी शैली में नृत्य, संगीत, मंच सज्जा और भाव-भंगिमा का ऐसा अद्भुत समन्वय होता था, जिसे देखकर दर्शक नाटक में नहीं, बल्कि एक चेतना के भीतर प्रवेश करता था।

मणिपुर से लेकर पूरी दुनिया तक गूंजता रहा उनका रंगमंच

मूल रूप से मणिपुर से ताल्लुक रखने वाले रतन थियम ने अपनी मातृभूमि के सांस्कृतिक स्वर को अंतरराष्ट्रीय रंगमंच के मंचों तक पहुंचाया। वे नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा के ही छात्र रहे और फिर उसी संस्था के आदर्श नायक बन गए।

उन्होंने चेनाम सांगेथन (Chorus Repertory Theatre) की स्थापना भी की, जो मणिपुर में रंगमंच के विकास का एक प्रमुख केंद्र बना।