निखिल कामथ और निकेश अरोड़ा की गहन बातचीत: AI, साइबर सुरक्षा और नेतृत्व की नई परिभाषा!

चंडीगढ़, 2 जुलाई: WTF के ‘People’ पॉडकास्ट का एक खास एपिसोड हाल ही में काफी चर्चा में रहा, जहां निवेशक और जीरोधा के सह-संस्थापक निखिल कामथ ने दुनिया की अग्रणी साइबर सुरक्षा कंपनी Palo Alto Networks के चेयरमैन और सीईओ निकेश अरोड़ा के साथ एक बेबाक, गहराई से भरी बातचीत की। ये चर्चा केवल तकनीकी मामलों तक सीमित नहीं थी, बल्कि इसमें ज़िंदगी के अनुभव, करियर के संघर्ष, जोखिम, नेतृत्व, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), क्वांटम कंप्यूटिंग और आने वाले कल की बदलती दुनिया की चर्चा भी समाहित थी।

1. शुरुआती दिनों से सीख और अस्वीकृति का दौर

निकेश अरोड़ा ने अपने बचपन की यात्रा साझा करते हुए बताया कि किस तरह उन्होंने एक “घुमंतू” जीवन जिया – उनके पिता भारतीय वायुसेना में थे, जिससे लगातार स्थानांतरण होता रहा। यह अनुभव, उनके अनुसार, अनुकूलन और लचीलेपन की नींव बना। उन्होंने अपने शैक्षणिक सफर को याद करते हुए कहा कि वह इतने “स्मार्ट” नहीं थे, और यहाँ तक कि उन्होंने CAT परीक्षा बीच में छोड़ दी थी सिर्फ़ एक फिल्म देखने के लिए।

1992 की मंदी के दौर में उन्होंने 400 से ज़्यादा कंपनियों को आवेदन भेजे, जिनमें से अधिकांश से उन्हें अस्वीकृति मिली। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। उन्होंने बताया कि वह आज भी वे अस्वीकृति पत्र सहेज कर रखते हैं। आखिरकार, Fidelity Investments ने उन्हें मौका दिया – वो भी तब जब उन्होंने पहले 7 बार उन्हें अस्वीकार किया था। यह कहानी आज के युवाओं को बताती है कि निरंतरता और धैर्य कैसे किसी को एक नई ऊंचाई तक पहुंचा सकता है।

2. साइबर खतरों की बदलती तस्वीर

एक समय था जब हैकर सिर्फ़ मज़े या आदर्शवाद के लिए काम करते थे – जिसे Hacktivism कहा जाता है। लेकिन निकेश बताते हैं कि आज साइबर हमले एक संगठित अपराध उद्योग बन चुके हैं, जहाँ अरबों डॉलर की फिरौती अज्ञात क्रिप्टोकरेंसी में दी जाती है। उन्होंने आगाह किया कि साइबर स्पेस अब सिर्फ़ डाटा या सिस्टम की बात नहीं है – यह राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ चुका है। रूस-यूक्रेन युद्ध इसका उदाहरण है, जहां साइबर हमले युद्ध का एक प्रमुख हिस्सा बन चुके हैं।

3. एजेन्टिक AI: खतरे की घंटी या अगला क्रांति का चरण?

निखिल ने जब पूछा कि आने वाले समय में सबसे बड़ा साइबर सुरक्षा खतरा क्या होगा, तो निकेश ने बिना झिझक “Agentic AI” की ओर इशारा किया। यह वो AI सिस्टम हैं जो अपने निर्णय खुद लेते हैं, और हमारे प्रतिनिधि बनकर कार्य करते हैं। अगर इन्हें गलत दिशा में निर्देशित किया जाए, तो ये गंभीर खतरों को जन्म दे सकते हैं। निकेश ने कहा, “हम इंसान शायद अभी तैयार नहीं हैं अपनी बुनियादी निर्णय क्षमता किसी और को सौंपने के लिए।”

4. क्या जीरोधा जैसे प्लेटफॉर्म इस बदलाव में टिक पाएंगे?

निखिल ने सवाल उठाया कि क्या AI की इस लहर में, जहां इंटरफेस बदल रहे हैं, ट्रस्ट और रेगुलेशन आधारित सिस्टम जैसे Zerodha टिक पाएंगे? इस पर निकेश ने कहा कि “रिकॉर्ड की प्रणालियाँ” समय और भरोसे से बनती हैं। चाहे वो रेगुलेटेड हों या बिजनेस की ज़रूरत हो, लेकिन अगर ये बदलाव की गति के साथ कदम नहीं मिला पाए, तो संभव है कि उन्हें जगह छोड़नी पड़े।

5. AI का लोकतंत्रीकरण और ब्रांड की भूमिका

क्या जब AI हर किसी को एक समान जानकारी और क्षमता दे देगा, तब भी बड़े ब्रांड्स की अहमियत बनी रहेगी? निकेश का मानना है – हां! उन्होंने कहा कि ब्रांड केवल डेटा का नहीं, अनुभव और विश्वास का प्रतीक होता है। उन्होंने कहा, “भले ही AI सूचना को लोकतांत्रिक बना दे, पर भरोसा और अनुभव आज भी निर्णायक भूमिका निभाते हैं।”

6. AI अंत नहीं, शुरुआत है

जब निखिल ने पूछा कि AI हमें कहां ले जा रहा है, तो निकेश ने सपाट जवाब दिया – भविष्य की कोई स्पष्ट तस्वीर नहीं है, पर बदलाव स्थायी है। महामारी जैसे संकटों के दौरान भी हम डर के बावजूद आगे बढ़े। उन्होंने ज़ोर दिया कि अनिश्चितता से डरने की बजाय, हमें उसमें अवसर ढूंढना चाहिए।

7. युवाओं के लिए मार्गदर्शन

निकेश ने कहा कि आज की पीढ़ी को तकनीक का लाभ उठाकर तेज़ी से काम करना आता है। लेकिन सिर्फ़ तेज़ी नहीं, बड़े सोच की भी ज़रूरत है। उन्होंने सलाह दी कि अगर आप केवल 10% बेहतर करने का सोच रहे हैं, तो यह पर्याप्त नहीं – आज की दुनिया में “10X” सोचने की ज़रूरत है।

8. भारत को अपना AI मॉडल बनाना चाहिए?

निखिल का सवाल था – क्या भारत को अपना स्वदेशी AI मॉडल बनाना चाहिए? निकेश ने कहा कि बिलकुल करना चाहिए, लेकिन यह आसान नहीं। भारत में इतनी बड़ी पूंजी (जैसे कि 50 अरब डॉलर) एक ही प्रोजेक्ट में झोंकने की इच्छाशक्ति अक्सर नहीं होती। फिर भी, भारत की बड़ी टेक-सेवी जनसंख्या इसे AI की दौड़ में एक अनदेखा मगर अहम खिलाड़ी बनाती है।

9. AI में निवेश: सोने की खदान या बुलबुला?

क्या हर AI स्टार्टअप पैसा बनाएगा? निकेश ने कहा कि ये एक “गोल्ड रश” की तरह है – सब भाग रहे हैं, लेकिन कौन टिकेगा, यह साफ नहीं। कुछ AI स्टार्टअप सिर्फ वैल्यूएशन पर टिके हैं, असल सॉल्यूशन पर नहीं। लेकिन लंबे समय में AI निश्चित तौर पर दक्षता बढ़ाएगा और लागत घटाएगा।

10. भारतीय नवाचार में बाधाएँ

भारत में टैलेंट है, लेकिन वैश्विक स्तर पर स्टार्टअप खड़ा करने में चुनौतियाँ हैं – संसाधनों की कमी, असफलता को लेकर सामाजिक नकारात्मकता, और बिजनेस करने में कठिनाई। निकेश ने इज़राइल का उदाहरण देते हुए कहा कि वहाँ असफलता को स्वीकार किया जाता है और फंडिंग दोबारा मिल जाती है। भारत को यही संस्कृति अपनानी होगी।

11. संस्थापक बनाम निष्पादक

निखिल ने पूछा कि क्या संस्थापक और “operator” – यानि गैर-संस्थापक CEO – में कोई मूलभूत अंतर है? निकेश ने माना कि संस्थापक के पास लंबी दृष्टि होती है, लेकिन एक कंपनी सिर्फ़ प्रोडक्ट से नहीं चलती – उसे सही टीम, मजबूत ऑपरेशंस और नेतृत्व की ज़रूरत होती है।

12. लैरी पेज और मासायोशी सोन से मिली सीख

लैरी पेज ने उन्हें सिखाया कि उत्पाद के लिए जुनून हर व्यवसाय की नींव है। उन्होंने बताया कि कैसे लैरी ने कहा था, “अगर मुझे दो घंटे मिलें, तो मैं तुम्हारा काम 20% बेहतर बना सकता हूं।” वहीं, मासा सोन ने उन्हें सिखाया कि जोखिम लेने की क्षमता, जुनून और साहस से बड़ी कोई पूंजी नहीं होती। मासा करोड़पति बनने के बाद भी लगातार जोखिम लेते रहे – यही विज़नरी सोच है।