कल धूमधाम से मनाई जाएगी महाशिवरात्रि..जानिएं भगवान शिव के सिर पर चंद्रमा की कथा

कल रविवार को महाशिवरात्री का त्योहार धूमधाम से मनाया जाएगा। इसके लिए मंदिर सज गए है घऱों में पूजा के लिए तैयारियां शुरु हो गई है। महाशिवरात्रि के दिन भगवान शिव की विधि विधान से पूजा-अर्चना की जाती है. शिव भक्त भोलेनाथ की कृपा पाने के लिए पूजा के साथ व्रत भी रखते हैं. भोलेनाथ के सिर पर मां गंगा विराजमान है

महाशिवरात्री को लेकर अनेको पौराणिक कथाएं है कहा जाता है एक बार माता पार्वती ने भगवान शिव से पूछा कि उन्हें कौन से अनुष्ठान सबसे ज्यादा प्रसन्न करते है तो भगवान शिव ने कहा कि फाल्गुन महीने के घटते महीने के चौहदवें दिन अपने भक्तों द्वारा बेल पत्र से उनकी आराधना करना उन्हें सबसे अधिक प्रसन्न करता है

कहा जाता है महाशिवरात्री की पूजा रात्रि काल में होती है इस तरह महाशिवरात्री को एक शुभ रात्री माना जाता है जब भगवान शिव के भक्त अपने दुखों से मुक्ती पाने के लिए उनकी शऱण में जाते है, इस रात्री का भक्त इंतजार करते है और भगवान शिव को प्रसन्न करने की कामना करते है

मां गंगा को क्यों सिर पर धारण करते हैं भगवान शिव?

एक और पौराणिक कथा है भागीरथ राजा ने अपने तप के द्वारा मां गंगा को धरती पर आने के लिए मनाया और उन्होने हठ की मां गंगा से इस पर माता गंगा ने कहा यदि वह सीधे स्वर्ग से पृथ्वी पर आएगी तो पृथ्वी उनका वेग नही संभाल सकेगी औऱ नष्ट हो जाएगी तब भागीरथ राजा ने भगवान शिव की आराधना की उनके तपस्या से भगवान शिव प्रसन्न हुए औऱ वर मागने को कहा तब भागीरथ ने सारी मनोरथ भगवान शिव को बताई तब ने जैसे ही माता गंगा धऱती पर आई भगवान शिव ने अपनी जटाओँ में उनको कैद कर लिया ।भगवान शिव ने उन्हें एक पोखरे में छोड़ा. जहां से वे सात धाराओं में बंटी. महाशिवरात्री के दिन भगवान शिव का अभिषेक गंगा जल से करने का विधान बताया गया है

भगवान शिव के सिर पर विराजमान हैं चंद्रमा

एक कथा के मुताबिक, देवताओं औऱ असुरों में अमृत को लेकर जब विवाद हुआ तो समुद्र मंथन से निकले विष से सृष्टि की रक्षा के लिए भगवान शिव ने विष को पी लिया था. इससे भगवान शिव का शरीर गर्म हो गया. तब चंद्रमा ने  भगवान शिव को शीतलता प्रदान करने के लिए उनके सिर पर विराज होने की प्रार्थना की. जब भगवान शंकर विष के तीव्र प्रभाव को सहन नहीं कर पाये तब देवताओं ने सिर पर चंद्रमा को धारण करने का निवेदन किया. देवताओं की आग्रह को स्वीकार करते हुए जब शंकर भगवान ने चंद्रमा को धारण किया. तब विष के प्रभाव की तीव्रता धीरे –धीरे कम होने लगी. तभी से चंद्रमा शिव के सिर पर विराजमान है.