जानिए सूर्य देव की बहन माता छठ की पूजा विधि, तिथि, समय और महत्व

दिवाली के बाद छठ पूजा अगला बड़ा त्योहार रहता है

छठ महापर्व सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि आस्था, श्रद्धा और आत्मसंयम का प्रतीक है.

दिवाली के छह दिन बाद मनाया जाने वाला यह पर्व खासकर बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश के लोगों के लिए बेहद महत्वपूर्ण होता है.

यह पर्व भगवान सूर्य और छठी मैया को समर्पित है. चार दिनों तक चलने वाला यह त्योहार उपवास और परिवार की सुख-समृद्धि के लिए प्रार्थना करने का समय होता है.

इस दिन महिलाएं 36 घंटे तक निर्जला व्रत रखती हैं.

इस साल छठ पूजा का त्योहार कल यानी 25 अक्टूबर से शुरू होने जा रहा है

और इसका समापन 28 अक्टूबर को होगा.  त्योहार के अंतिम दो दिन सबसे अधिक महत्वपूर्ण होते हैं,

जब सूर्य देव को संध्या और प्रातः अर्घ्य अर्पित किया जाता है. छठ उत्सव की शुरुआत ‘नहाय-खाय’ से होती है, जिस दिन व्रत रखने वाले श्रद्धालु पवित्र स्नान करते हैं

और लौकी, चना दाल और चावल का सात्त्विक भोजन ग्रहण करते हैं. छठ पूजा का समापन जैसे जैसे निकट आता है,

लोग बड़े ही उत्साह से गीत गाने, नृत्य करने और खेल-कूद जैसी सांस्कृतिक गतिविधियों में भाग लेते हैं.

छठ का पर्व चार दिन का होता है, जिसमें विशेष पूजन और अनुष्ठान किए जाते हैं.

छठ पर्व की शुरुआत नहाय-खाय के साथ होती है, दूसरे दिन की पूजा को खरना कहा जाता है.

वहीं, तीसरे दिन सूर्य भगवान की पूजा की जाती है जिसमें ढलते हुए सूरज को अर्घ्य दिया जाता है.

चौथे दिन उगते हुए सूरज को अर्घ्य देकर इस व्रत का पारण और समापन होता है. छठ पूजा का व्रत संतान की लंबी आयु और सुख समृद्धि के लिए रखा जाता है।

सदियों पुराने होने वाले इस पर्व का मूल उद्देश्य ईश्वर के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना है,

जिन्होंने मनुष्य को जीवन के लिए आवश्यक तत्व जैसे सूर्यप्रकाश, अन्न और जल प्रदान किए हैं.

आईये छठ पूजा के त्योहार की तारीख, समय और महत्व के बारे में 

छठ पूजा का तीसरे दिन में शाम को पूजा की जाती है जब भगवान सूर्य को संध्या अर्घ्य अर्पित किया जाता है,

तीसरा दिन छठ पर्व का मुख्य दिन होता है. इस वर्ष संध्या अर्घ्य सोमवार, 27 अक्टूबर 2025 को अर्पित किया जाएगा,

जबकि अंतिम प्रातः अर्घ्य मंगलवार, 28 अक्टूबर 2025 को दिया जाएगा.

जानते है छठ पूजा 2025 की तिथि और समय

1 पहला दिन शनिवार, 25 अक्टूबर 2025: नहाय-खाय

सूर्योदय का समय: सुबह 6:28 बजे
सूर्यास्त का समय: शाम 5:42 बजे

छठ पूजा के पहले दिन, जो कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को पड़ता है,

व्रत रखने वाले श्रद्धालु पवित्र स्नान करते हैं और प्रसाद की तैयारी के लिए जल घर लाते हैं

इस दिन चने की दाल, कद्दू (लौकी) और चावल का सात्त्विक प्रसाद तैयार किया जाता है.

 दूसरा दिन रविवार, 26 अक्टूबर 2025: खरना

सूर्योदय का समय: सुबह 6:29 बजे
सूर्यास्त का समय: शाम 5:41 बजे

छठ पूजा का दूसरा दिन खरना या लोहंडा कहलाता है. इस दिन व्रत रखने वाले श्रद्धालु पूरे दिन उपवास रखते हैं

और इसे रसिया (गुड़ से बनी खीर) और रोटी के प्रसाद से समाप्त करते हैं.

इस दिन नमक का सेवन नहीं किया जाता और केवल एक ही भोजन लिया जाता है,

जिसके बाद 36 घंटे का छठ पूजा का उपवास शुरू होता है.

 तीसरा दिन सोमवार, 27 अक्टूबर 2025: संध्या अर्घ्य

पूजा समय: सूर्यास्त का समय 5:40 बजे

इसी समय संध्या अर्घ्य अर्पित किया जाएगा । छठ पूजा के तीसरे दिन, व्रत रखने वाले श्रद्धालु बिना भोजन और पानी के उपवास करते हैं.

संध्या अर्घ्य की तैयारी में विभिन्न प्रसाद जैसे ठेकुआ, नारियल, डाब़ नींबू, केले, सेब और अन्य मीठे और नमकीन वस्तुएँ बांस की टोकरी (सूप या दौरा) में रखी जाती हैं.

सूर्यास्त से पहले लोग किसी जलाशय के पास संध्या अर्घ्य अर्पित करने की तैयारी करते हैं.

सूर्यास्त के समय, व्रतधारी श्रद्धालु पानी में घुटनों तक खड़े होकर, प्रसाद से भरी सूप उठाकर अस्त होते सूर्य को संध्या अर्घ्य अर्पित करते हैं.

 

 चौथा दिन मंगलवार, 28 अक्टूबर 2025: उषा अर्घ्य

पूजा समय: 28 अक्टूबर को सूर्योदय का समय सुबह 6:30 बजे है

इसी समय व्रत धारी श्रद्धालु द्वारा उषा अर्घ्य अर्पित किया जाएगा

छठ पूजा के अंतिम दिन, व्रतधारी श्रद्धालु सूर्योदय से पहले फिर से जलाशयों की ओर जाते हैं

ताकि उगते सूर्य को उषा अर्घ्य अर्पित किया जा सके. यह अनुष्ठान संध्या अर्घ्य के समान ही होता है.

पूजा समाप्त होने के बाद, व्रतधारी उपवास खोलते हैं और प्रसाद सभी में वितरित किया जाता है.

 छठ पूजा के लाभ

जिन लोगों को संतान नहीं हो रही है उन्हें ये व्रत लाभ देता है.

इसके अलावा, संतान पक्ष से जुड़ी कोई समस्या हो तो भी ये व्रत लाभदायक कहलाता है.

अगर कुष्ठ रोग या पाचन तंत्र की समस्या हो तो भी ये व्रत रखना शुभ है.

कुंडली में सूर्य की स्थिति खराब हो तो भी ये व्रत रखना लाभकारी होगा.

 जाने छठी मैया कौन है?

छठी मैया के बारें में मार्कण्डेय पुराण में बताया गया है कि सृष्टि की रचना करने वाली देवी प्रकृति ने अपने आप को छठ भागों में बांटा था।

प्रकृति देवी का जो छठा भाग था वह सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है।

मां के छठे स्वरूप को सर्वश्रेष्ठ मातृदेवी के रूप में जानते हैं। जोकि ब्रह्मा जी की मानस पुत्री हैं।

मार्कण्डेय पुराण में बताया गया है कि इनके छठे अंश को छठी मैय्या के नाम से जाना गया है।

 छठ पर क्यों होती है छठी मैया और सूर्यदेव की पूजा

मान्यता है कि छठी मैय्या और सूर्य़देव भाई बहन है और छठी मैया को सूर्यदेव की बहन माना जाता है।

इस वजह से छठ के इस पर्व पर छठी मैया और सूर्यदेव दोनों की पूजा की जाती है।

ऐसा कहा जाता है कि जब किसी नवजात बच्चे का जन्म होता है तो उसके बाद 6 महीने तक छठी मैय्या उनके पास रहती हैं

और बच्चों की रक्षा करती हैं। छठ में पूजा में कुछ विशेष सावधानी भी बरतनी रहती है जैसे इस पूजा में बहुत साफ सफाई की जरुरत रहती है ,

छठ मैया को चढ़ाने वाला प्रसाद जिसको ठैकुआ कहा जाता है इस प्रसाद को बहुत ही सफाई के साथ श्रद्धालु बनाते है।