करवा चौथ का व्रत 10 अक्ट्बर 2025 को रखा जाएगा। विवाहित महिलाओं के लिए यह त्यौहार काफी मायने रखता है।
करवा चौथ के दिन महिलाएं बिना अन्न और पानी के पूरा दिन उपवास रखती हैं।
इसके बाद एक बार रात में ही करवा चौथ की पूजा और चांद को अर्घ्य देकर पति के हाथ से पानी पीकर अपना व्रत खोलती हैं।
ये व्रत सुहागिन औरतों के अलावा अच्छे वर के लिए लड़कियां भी रखती हैं जिनकी शादी होने वाली हो या फिर शादी की उम्र हो गई हो।
ये व्रत निर्जला रखा जाता है और शाम के समय शुभ मुहूर्त में पूजा कर चंद्रमा को अर्घ्य देकर व्रत खोला जाता है।
जानिए जानते है इस व्रत की महिमा और इतिहास
करवा चौथ की परंपरा देवताओं के समय से चली आ रही है। पौराणिक कथाओं के अनुसार एक बार देवताओं और दानवों में भयंकर युद्ध शुरू हो गया और उस युद्ध में देवताओं की हार होने लगी। तब भयभीत देवता ब्रह्मदेव के पास गए और उनसे रक्षा की प्रार्थना की। ब्रह्मदेव ने कहा कि इस संकट से बचने के लिए सभी देवताओं की पत्नियों को अपने-अपने पतियों के लिए व्रत रखना चाहिए और सच्चे दिल से उनकी विजय की कामना करनी चाहिए।
ब्रह्मदेव ने यह वचन दिया कि ऐसा करने पर इस युद्ध में देवताओं की जीत निश्चित हो जाएगी। ब्रह्मदेव के इस सुझाव को सभी देवताओं ने स्वीकार किया। ब्रह्मदेव के कहे अनुसार कार्तिक माह की चतुर्थी के दिन सभी देवताओं की पत्नियों ने व्रत रखा और अपने पतियों की विजय के लिए प्रार्थना की।करवा माता ने उनकी प्रार्थना को स्वीकार किया और देवताओं के प्राणों की रक्षा की और देवता युद्घ में विजय हुए।
इस खुशखबरी को सुन कर सभी देवताओं की पत्नियों ने अपना व्रत खोला और खाना खाया। उस समय आकाश में चांद भी निकल आया था। माना जाता है कि इसी दिन से करवा चौथ के व्रत के परंपरा शुरू हुई।
करवा चौथ व्रत का महत्व:
इस व्रत में स्त्रियों द्वारा भगवान शिव शंकर, माता पार्वती, कार्तिकेय, गणेश और चंद्र देवता की पूजा का विधान है। व्रत वाले दिन कथा सुनना बेहद जरूरी माना गया है। ऐसी मान्यता है कि करवाचौथ की कथा सुनने से विवाहित महिलाओं का सुहाग बना रहता है, उनके घर में सुख, शान्ति,समृद्धि आती है और सन्तान सुख मिलता है। महाभारत में भी करवा चौथ के महात्म्य के बारे में बताया गया है।
भगवान श्री कृष्ण ने द्रौपदी को करवा चौथ की कथा सुनाते हुए कहा था कि पूरी श्रद्धा और विधि-पूर्वक इस व्रत को करने से समस्त दुख दूर हो जाते हैं। श्री कृष्ण भगवान की आज्ञा मानकर द्रौपदी ने भी करवा-चौथ का व्रत रखा था। इस व्रत के प्रभाव से ही पांचों पांडवों ने महाभारत के युद्ध में विजय हासिल की।
इसके बाद से ही करवाचौथ व्रत की महिमा और इस व्रत पर सभी के विश्वास बढ़ गए और इसकी परंपरा शुरु हो गई।
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