चंडीगढ़, 25 जून: भारत के सनातन धर्म में जब भी आस्था और परंपरा की बात होती है, तो भगवान श्री जगन्नाथ की रथयात्रा का उल्लेख स्वतः हो जाता है। यह सिर्फ एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि आत्मा को छू लेने वाला एक अद्भुत और दुर्लभ अनुभव है। पुरी (ओडिशा) से निकलने वाली यह यात्रा करोड़ों भक्तों के लिए साल भर की प्रतीक्षा का कारण होती है।
भगवान श्री जगन्नाथ, उनके बड़े भ्राता बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ जब रथ में सवार होकर नगर भ्रमण के लिए निकलते हैं, तो ऐसा लगता है जैसे स्वयं साक्षात भगवान हमारे बीच विचरण कर रहे हों। भक्तों के लिए यह अवसर अत्यंत दुर्लभ और पुण्यकारी माना जाता है। यह वह क्षण होता है जब ईश्वर खुद अपने भक्तों के बीच आकर उन्हें दर्शन, स्पर्श और कृपा का वरदान देते हैं।
भक्ति की शक्ति: भगवान का दिल छूने वाली भावनाएँ
शास्त्रों में वर्णित है कि भगवान अपने भक्तों की भावनाओं को समझते हैं, वे केवल याचना या पूजा के बल पर कृपा नहीं करते, बल्कि भक्त की निष्कलंक श्रद्धा और विनम्र भावनाओं से ही प्रसन्न हो जाते हैं। इसीलिए कहा जाता है कि जो कुछ नहीं मांगता, उसे भी सब कुछ मिल जाता है – ठीक वैसे ही जैसे भगवान श्रीकृष्ण ने अपने मित्र सुदामा को बिना माँगे धन-धान्य से भर दिया।
श्री जगन्नाथ रथयात्रा के दौरान भक्त भगवान के रथ को खींचते हैं, उनके दर्शन करते हैं और इस प्रक्रिया में उनके मन की सारी विकृतियाँ, अहंकार और भौतिक इच्छाएँ समाप्त हो जाती हैं। भगवान को अभिमान स्वीकार नहीं, वे प्रेम और भक्ति के वशीभूत होते हैं।
पौराणिक महत्व: दर्शन मात्र से मिलती है मुक्ति
ब्रह्म पुराण में कहा गया है कि इस यात्रा के दर्शन मात्र से मनुष्य संसार के जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाता है। जो लोग रथ की रस्सी खींचते हैं, वे ऐसा पुण्य अर्जित करते हैं जो सैकड़ों अश्वमेध यज्ञों के समान होता है। यह एक ऐसा दुर्लभ अवसर है, जिसमें भाग लेना जीवन को धन्य कर देता है।
स्कंद पुराण में उल्लेख है कि भगवान जगन्नाथ के रथ की परिक्रमा करने वाले, विष्णुसहस्त्रनाम का पाठ करने वाले, अथवा भगवान को चंवर झुलाने या पुष्पों से हवा करने वाले भक्तों को ब्रह्मलोक और वैकुंठ की प्राप्ति होती है।
जो मांगा वो पाया, जो नहीं मांगा वो भी प्रभु ने दिया
इस रथयात्रा में जो भी श्रद्धालु सम्मिलित होता है, वह किसी न किसी भावना या कामना के साथ आता है। लेकिन भगवान जगन्नाथ की कृपा ऐसी है कि वे उस भक्त को उसकी इच्छा के अनुसार ही नहीं, बल्कि उससे कहीं अधिक देने का सामर्थ्य रखते हैं। इस यात्रा में आस्था से की गई सेवा, दान और उपासना अक्षय पुण्य प्रदान करती है, जो मनुष्य के समस्त पापों का नाश कर देती है।
भगवान के दिव्य रूप की कथा: रथयात्रा का पौराणिक आधार
एक पौराणिक कथा के अनुसार, जब माता रोहिणी द्वारिका में रानियों को श्रीकृष्ण की ब्रज लीलाओं का वर्णन कर रही थीं, तब उन्होंने किसी पुरुष के अंदर आने से रोकने हेतु सुभद्रा जी को द्वार पर बैठा दिया। तभी श्रीकृष्ण और बलभद्र वहाँ आए और अंदर न जाकर बाहर ही लीला-वर्णन सुनने लगे। लीला में भावविभोर होकर दोनों भाई स्तब्ध हो गए।
उसी समय वहाँ पहुंचे नारद मुनि ने इस दिव्य रूप को मूर्त रूप देने की प्रार्थना की। भगवान श्रीकृष्ण ने नारद को वचन दिया कि वे नीलाद्री क्षेत्र (वर्तमान पुरी) में इसी रूप में विराजमान होंगे। ऐसा माना जाता है कि यही वचन बाद में जगन्नाथ रथयात्रा के रूप में प्रकट हुआ।
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