चंडीगढ़, 3 जून: जब कभी अचानक यात्रा की ज़रूरत पड़ती है, तो भारतीय रेलवे की ‘तत्काल टिकट बुकिंग’ सेवा एकमात्र सहारा बनती है। लेकिन अब यह सेवा यात्रियों के लिए सहारा कम और सिरदर्द ज़्यादा बनती जा रही है। हाल ही में एक व्यापक सर्वेक्षण में जो सच्चाई सामने आई है, उसने इस प्रणाली पर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यात्रियों ने खुलकर अपनी शिकायतें दर्ज की हैं और बताया है कि यह सिस्टम कितना अव्यवस्थित और पक्षपातपूर्ण हो गया है।
हर बार निराशा, एक मिनट में वेटिंग!
देशभर के 396 जिलों के 55,000 से ज्यादा यात्रियों की प्रतिक्रिया पर आधारित लोकलसर्कल्स (LocalCircles) के एक सर्वे में सामने आया है कि 73% यात्रियों को तत्काल बुकिंग विंडो खुलते ही एक मिनट के भीतर वेटिंग लिस्ट में डाल दिया गया। यानी जैसे ही टिकट बुकिंग शुरू होती है, सीटें पहले ही भर चुकी होती हैं। इससे आम लोगों के बीच यह संदेह गहराता जा रहा है कि क्या ये टिकट पहले से ही कुछ चुनिंदा लोगों के पास जा रही हैं? क्या एजेंट्स या बॉट्स इस पूरे सिस्टम पर कब्जा कर चुके हैं?
तकनीकी परेशानियों से त्रस्त यात्री
आईआरसीटीसी की वेबसाइट और मोबाइल ऐप का उपयोग करने वाले यात्रियों को टेक्नोलॉजी से जुड़ी गंभीर दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। लोग बताते हैं कि:
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बुकिंग विंडो खुलते ही वेबसाइट या ऐप क्रैश हो जाते हैं।
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पेज खुलते-खुलते ही सीटें फुल हो जाती हैं।
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पेमेंट तो कट जाता है, लेकिन टिकट कन्फर्म नहीं होता।
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रिफंड पाने में लंबा इंतजार करना पड़ता है।
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बुकिंग के दौरान ही सीटें ‘अनअवेलेबल’ बताई जाने लगती हैं।
इसका नतीजा यह होता है कि जरूरतमंद यात्री तत्काल टिकट से वंचित रह जाते हैं, जबकि टिकट का खेल पहले ही कहीं और सेट हो चुका होता है।
आंकड़े जो सिस्टम की हालत बयां करते हैं
सर्वे के आंकड़े चौंकाने वाले हैं और बताते हैं कि यात्रियों की सफलता की दर कितनी कम हो चुकी है:
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29% यात्रियों ने कहा कि उन्हें केवल 0-25% बार ही सफलता मिली।
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29% ने बताया कि उन्हें कभी भी टिकट बुक करने में सफलता नहीं मिली।
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सिर्फ 10% यात्रियों ने बताया कि वह हर बार सफल रहे।
इसका मतलब यह हुआ कि 60% से ज्यादा लोगों को या तो बहुत कम सफलता मिली या बिल्कुल भी नहीं मिली। यह एक ऐसी स्थिति है जो इस सेवा की उपयोगिता पर बड़ा प्रश्नचिह्न लगाती है।
जहां कभी रेलवे की तत्काल टिकट सेवा पर लोगों का भरोसा था, वहीं अब वह भरोसे की नींव हिलती नजर आ रही है। सर्वे में बताया गया कि सिर्फ 40% लोग ही अब भी आईआरसीटीसी के जरिए टिकट बुक करने पर भरोसा करते हैं। बाकी लोग अब या तो रेलवे एजेंट्स के माध्यम से टिकट बुक करवा रहे हैं या फिर स्टेशनों पर लंबी कतारों में खड़े होकर अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। यह न सिर्फ यात्रियों के समय की बर्बादी है, बल्कि व्यवस्था की विफलता का भी उदाहरण है।
गौरतलब है कि 2016 में तत्काल टिकट बुकिंग को लेकर एक बड़ा घोटाला सामने आया था, जिसमें फर्जी नामों से टिकट बुक कर उन्हें मोटी रकम लेकर असली यात्रियों को बेचा जा रहा था। इसके बाद रेलवे ने कई उपाय किए थे – जैसे कि कैप्चा कोड, OTP आधारित लॉगिन, बुकिंग की संख्या पर सीमा, आदि। लेकिन अब भी समस्याएं जस की तस बनी हुई हैं। तकनीकी सुधार होने के बावजूद एजेंट्स और स्क्रिप्ट्स की पकड़ आज भी बरकरार है।
लोकलसर्कल्स ने यह रिपोर्ट रेल मंत्रालय को सौंपने का फैसला किया है, ताकि यात्रियों की परेशानियों को गंभीरता से लिया जा सके और सिस्टम में पारदर्शिता और सुधार लाया जा सके। यह कदम जरूरी भी है, क्योंकि यदि यह सेवा जरूरतमंदों तक सही ढंग से नहीं पहुंची, तो फिर इसका अस्तित्व ही व्यर्थ हो जाएगा।
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