चंडीगढ़, 24 जून: ईरान और इज़राइल के बीच जब एक अस्थायी युद्धविराम की घोषणा हुई, तो उससे ठीक पहले अंतरराष्ट्रीय मंच पर बेहद चौंकाने वाली और तनाव बढ़ाने वाली गतिविधियां देखने को मिलीं। रूस, चीन और पाकिस्तान – ये तीन प्रभावशाली देश – अचानक खुलकर ईरान के समर्थन में सामने आए और न केवल अमेरिका-इज़राइल की सैन्य कार्रवाई की निंदा की, बल्कि यह भी कहा कि ईरान को अपनी सुरक्षा के लिए परमाणु विकल्प तक अपनाने का अधिकार मिलना चाहिए।
ईरान पर अमेरिकी हमला और उसके बाद का माहौल
2025 में, अमेरिका ने ईरान के भीतर स्थित उसके प्रमुख परमाणु केंद्रों पर गुप्त तरीके से हमला किया। फोर्दो, नतांज और इस्फहान स्थित संवेदनशील और संरक्षित ठिकानों को ‘बंकर बस्टर’ बमों से निशाना बनाया गया। इस हमले से ईरान के परमाणु कार्यक्रम को जबरदस्त नुकसान पहुंचा।
इसके जवाब में ईरान ने तीखी प्रतिक्रिया दी और कहा कि यदि फिर से ऐसी कोई कार्रवाई की गई, तो वह अमेरिका और उसके सहयोगी देशों के सैन्य ठिकानों को पूरी तरह वैध लक्ष्य मानेगा। इसी पृष्ठभूमि में अब दुनिया की तीन बड़ी ताकतें – रूस, चीन और पाकिस्तान – ईरान को ‘सशक्त आत्मरक्षा’ के नाम पर खुला समर्थन दे रही हैं।
रूस की चेतावनी और समर्थन
रूस के पूर्व राष्ट्रपति दिमित्री मेदवेदेव ने एक इंटरव्यू में कहा कि अब समय आ गया है कि कुछ देशों को अपने हितों की सुरक्षा के लिए परमाणु विकल्पों पर भी विचार करना चाहिए। उन्होंने स्पष्ट रूप से ईरान का नाम नहीं लिया, लेकिन संकेत इतने मजबूत थे कि उनका इशारा ईरान की ओर ही था।
बाद में हालांकि उन्होंने यह सफाई दी कि रूस किसी भी प्रकार से परमाणु अप्रसार संधि (NPT) का उल्लंघन नहीं करेगा, लेकिन उनका यह भी मानना है कि जब तक दुनिया में शक्ति का संतुलन नहीं बनता, तब तक किसी भी देश को अपनी सुरक्षा को लेकर चुप नहीं रहना चाहिए।
चीन की कड़ी प्रतिक्रिया – युद्ध नहीं, कूटनीति जरूरी
चीन ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में अमेरिका और इज़राइल के हमलों को वैश्विक कानून के खिलाफ बताते हुए तीखी आपत्ति दर्ज करवाई। बीजिंग का साफ कहना है कि इस तरह के सैन्य हमलों से न केवल क्षेत्रीय शांति को खतरा होता है, बल्कि इससे दुनिया भर में तनाव और अविश्वास का माहौल भी बनता है।
चीन ने सुझाव दिया है कि युद्धविराम को तुरंत लागू किया जाए और सभी पक्ष शांति वार्ता के जरिए समाधान निकालने का प्रयास करें। बीजिंग ने यह भी स्पष्ट किया कि सैन्य शक्ति से किसी समस्या का स्थायी हल नहीं निकल सकता।
पाकिस्तान की प्रतिक्रिया – संतुलन ज़रूरी है
पाकिस्तान ने BRICS समूह की एक बंद बैठक में ईरान को अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए ‘उचित निर्णय लेने’ का समर्थन दिया। इस्लामाबाद का यह भी कहना है कि यदि क्षेत्र में परमाणु शक्ति का संतुलन जरूरी है, तो वह केवल एक देश के पास नहीं होना चाहिए।
पाकिस्तानी अधिकारियों का मानना है कि पश्चिमी देशों ने ईरान को हमेशा एक खतरे के रूप में पेश किया है, जबकि असली खतरा उस असमान शक्ति संतुलन से है, जो क्षेत्रीय अस्थिरता का कारण बनता है।
संयुक्त राष्ट्र में बहस और यूरोप की चिंता
इस पूरे घटनाक्रम पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में आपात बैठक बुलाई गई। यूरोपीय देशों ने यह चिंता जताई कि यदि इस तरह के बयान और रणनीतियां सामने आती रहीं, तो परमाणु हथियारों की नई दौड़ शुरू हो सकती है।
उनका यह भी कहना है कि क्षेत्र में शांति बनाए रखने के लिए सभी पक्षों को संयम बरतना चाहिए और अंतरराष्ट्रीय समझौतों का सम्मान करना चाहिए।
अमेरिका और इज़राइल की तीखी प्रतिक्रिया
वहीं अमेरिका और इज़राइल ने रूस, चीन और पाकिस्तान के बयानों को ‘भड़काने वाला’ करार दिया है। दोनों देशों का कहना है कि इस प्रकार के बयान आतंकवाद को बढ़ावा दे सकते हैं और वैश्विक सुरक्षा के लिए खतरा पैदा कर सकते हैं।
वॉशिंगटन और तेल अवीव ने यह भी आरोप लगाया है कि कुछ देश जानबूझकर पश्चिमी सैन्य हस्तक्षेप के खिलाफ माहौल बनाना चाहते हैं और इससे ईरान को परमाणु हथियारों की दिशा में बढ़ने का एक ‘राजनीतिक बहाना’ मिल सकता है।
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