चंडीगढ़, 23 जून: ईरान के परमाणु ठिकानों पर अमेरिका की हालिया बमबारी ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति को उबाल पर ला दिया है। इस हमले ने जहां मध्य पूर्व में संघर्ष की आग को और भड़काया है, वहीं चीन ने इस पर खुलकर विरोध जताया है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की आपात बैठक में चीन के स्थायी प्रतिनिधि फू कोंग (Fu Cong) ने अमेरिका के रुख की कड़ी निंदा करते हुए चेतावनी दी कि अगर हालात नहीं संभाले गए, तो यह पूरा क्षेत्र युद्ध की आग में झुलस सकता है।
उन्होंने कहा, “हम इन हमलों की घोर निंदा करते हैं। अमेरिका को तुरंत सैन्य कार्रवाई रोकनी चाहिए और इजराइल को भी पीछे हटना चाहिए। अगर ऐसा नहीं हुआ, तो पूरा मध्य पूर्व एक जंग का मैदान बन जाएगा और इसके असर से पूरी दुनिया प्रभावित होगी।”
तेल के पीछे छिपा चीन का ‘शांति प्रेम’?
चीन भले ही संयुक्त राष्ट्र में ‘शांति और स्थिरता’ की बात कर रहा हो, लेकिन कूटनीतिक विश्लेषकों की मानें तो उसके विरोध के पीछे केवल वैश्विक शांति की चिंता नहीं है — इसमें तेल की सुरक्षा की बड़ी भूमिका है।
ईरान के दक्षिण में स्थित हॉर्मुज की खाड़ी (Strait of Hormuz) से होकर हर दिन करीब 5 मिलियन बैरल कच्चा तेल चीन पहुंचता है। यह रूट चीन की ऊर्जा जरूरतों के लिए बेहद अहम है। अगर ईरान इस जल मार्ग को बंद करने की धमकी भी देता है, तो चीन की तेल आपूर्ति ठप हो सकती है, जिससे उसकी ऊर्जा नीति पर गंभीर असर पड़ सकता है।
यानी चीन का अमेरिका पर सार्वजनिक हमला कूटनीति का हिस्सा होने के साथ-साथ ऊर्जा सुरक्षा को लेकर चिंता का भी संकेत है।
फू कोंग का अमेरिका पर सीधा हमला
राजदूत फू कोंग ने तीखी भाषा में अमेरिका को चेतावनी देते हुए कहा, “हर समस्या का हल बमों से नहीं निकलता। यह कोई हॉलीवुड फिल्म नहीं है जहाँ हीरो आखिरी सीन में सब ठीक कर देता है। असल जिंदगी में ऐसे कदम अराजकता और विनाश लेकर आते हैं।”
उन्होंने आगे कहा कि अमेरिका का यह कदम न केवल क्षेत्रीय स्थिरता को खतरे में डाल रहा है, बल्कि वैश्विक स्तर पर ऊर्जा संकट और मानवीय त्रासदी को भी जन्म दे सकता है।
चीन की दोहरी रणनीति – शांति की बात, पर ऊर्जा की फिक्र
चीन का यह आक्रामक कूटनीतिक रुख दिखाता है कि वह अब सिर्फ ‘नरम शक्ति’ के रूप में नहीं, बल्कि अपने रणनीतिक हितों की सुरक्षा के लिए सीधे मोर्चा लेने को भी तैयार है।
एक तरफ वह वैश्विक मंचों पर युद्ध के खिलाफ आवाज उठा रहा है, वहीं दूसरी ओर उसकी असल चिंता है – तेल की निर्बाध आपूर्ति।
इस पूरे घटनाक्रम ने दुनिया को यह भी दिखा दिया है कि कूटनीतिक बयान अक्सर परदे के पीछे छिपे आर्थिक और रणनीतिक हितों से प्रेरित होते हैं।
नतीजा क्या हो सकता है?
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अगर अमेरिका और ईरान के बीच टकराव और गहराता है, तो पूरे मध्य पूर्व में अस्थिरता बढ़ सकती है।
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चीन जैसे देश जो ऊर्जा के लिए इस क्षेत्र पर निर्भर हैं, उन्हें गंभीर आर्थिक झटका लग सकता है।
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वैश्विक तेल बाजार में उथल-पुथल की संभावना है, जिससे विकासशील देशों की अर्थव्यवस्था प्रभावित हो सकती है।
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