तलाक में बचानी है संपत्ति? प्राइवेट ट्रस्ट बन रहा है अमीरों से लेकर मिडिल क्लास तक का गुप्त हथियार!

चंडीगढ़, 21 जुलाई: भारत में तलाक के बाद संपत्ति के बंटवारे को लेकर अक्सर लंबी कानूनी लड़ाइयाँ देखने को मिलती हैं। खासकर जब शादी टूटने के बाद पूर्व पत्नी द्वारा पति की संपत्ति पर अधिकार जताया जाता है, तो कई बार यह मामला विवादास्पद हो जाता है और भावनात्मक रूप से भी दोनों पक्षों पर असर डालता है। ऐसे में अब एक नया और प्रभावी तरीका तेजी से सामने आ रहा है, जिससे लोग अपनी मेहनत की कमाई और पारिवारिक संपत्ति को कानूनी उलझनों से बचा रहे हैं — प्राइवेट फैमिली डिस्क्रेशनरी ट्रस्ट

यह ट्रस्ट एक ऐसा कानूनी ढांचा है जो संपत्ति के मालिकाना हक को व्यक्ति के नाम से हटाकर एक संस्था (ट्रस्ट) में स्थानांतरित कर देता है, और व्यक्ति सिर्फ उसका ‘लाभार्थी’ (beneficiary) बनता है। इससे तलाक की स्थिति में पत्नी संपत्ति पर कानूनी दावा नहीं कर सकती क्योंकि वह व्यक्ति के नाम पर नहीं होती।

जब शादी टूटी लेकिन संपत्ति बच गई

एक दिलचस्प उदाहरण दिल्ली के एक कपड़ा निर्यातक परिवार का है। उनके बेटे की शादी ज्यादा समय तक नहीं चली और जल्द ही तलाक हो गया, लेकिन पहले से बनाई गई योजना के कारण उन्हें कोई संपत्ति गंवानी नहीं पड़ी। उन्होंने शादी से पहले ही अपने बेटे के लिए एक ट्रस्ट बना दिया था, जिसमें उसके व्यवसाय और पारिवारिक घर को शामिल किया गया था। तलाक के बाद पत्नी चाहकर भी इन संपत्तियों पर दावा नहीं कर सकी।

मुंबई के एक बड़े जौहरी ने भी कुछ ऐसा ही कदम उठाया। उन्होंने अपनी पूरी संपत्ति एक ट्रस्ट के अधीन कर दी और अपने बेटे को उसका लाभार्थी घोषित कर दिया। बाद में जब बेटे ने तलाक के लिए अर्जी दी, तो उसकी पत्नी ने उन संपत्तियों पर दावा किया जिन्हें वह अपने विवाहित जीवन का हिस्सा मानती थी, लेकिन कानूनी रूप से वह किसी भी संपत्ति की हकदार नहीं बन सकी।

ट्रस्ट क्या करता है और कैसे देता है सुरक्षा?

इनहेरिटेंस नीड्स सर्विसेज के संस्थापक रजत दत्ता बताते हैं कि इस तरह के ट्रस्ट का मूल उद्देश्य संपत्ति को ट्रस्टी के माध्यम से लाभार्थियों के हित में संरक्षित रखना होता है। इस संरचना में यदि ट्रस्ट का लाभार्थी किसी बैंक से कर्ज लेता है और चुका नहीं पाता, तब भी बैंक ट्रस्ट की संपत्ति को जब्त नहीं कर सकता। क्योंकि कानूनी रूप से वह संपत्ति लाभार्थी की नहीं होती — वह ट्रस्ट के नाम पर होती है।

इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि न केवल तलाक की स्थिति में संपत्ति सुरक्षित रहती है, बल्कि अगर कोई अन्य कानूनी दावा या देनदारी आती है, तो उससे भी संपत्ति को बचाया जा सकता है।

अब सिर्फ अमीर नहीं, मिडिल क्लास भी उठा रहा है फायदा

पहले इस तकनीक को सिर्फ बड़े औद्योगिक घरानों और अमीरों द्वारा अपनाया जाता था। लेकिन अब यह तरीका मध्यम वर्ग के लोगों के बीच भी लोकप्रिय हो रहा है, जो अपने जीवन भर की कमाई और पुश्तैनी संपत्ति को किसी भी तरह की कानूनी उलझन या बंटवारे से बचाना चाहते हैं। खासकर वे परिवार, जिनकी शादी अंतर-धार्मिक, अंतर-जातीय या विदेशियों से हुई है, वे इस विकल्प को और भी ज्यादा प्राथमिकता दे रहे हैं।

दिल्ली की एक वकील ने बताया कि उनके पास एक मामला आया जिसमें एक महिला अपनी शादी के बाद लगातार पति से आर्थिक सहायता के लिए संघर्ष कर रही थी। लेकिन उसकी खुद की संपत्ति सुरक्षित रही, क्योंकि वह उसके पिता द्वारा बनाए गए एक ट्रस्ट के तहत थी, जो विशेष रूप से अपनी बेटी और नातियों के लिए बनाया गया था। इस तरह ट्रस्ट पुरुषों के साथ-साथ महिलाओं को भी संपत्ति की सुरक्षा देने का एक महत्वपूर्ण जरिया बन चुका है।

कैसे बनाया जाता है यह ट्रस्ट?

एवेंडस वेल्थ मैनेजमेंट के फैमिली ऑफिस सॉल्यूशंस के प्रमुख आश्विनी चोपड़ा के अनुसार, ट्रस्ट को इस तरह डिज़ाइन किया जाता है कि कानूनी रूप से बेटे (या बेटी) के नाम पर कोई संपत्ति नहीं होती। वह केवल ट्रस्ट से लाभ प्राप्त करता है। ऐसे में जब तलाक होता है, तो संपत्ति पर कानूनी दावा करने की संभावना बेहद कम हो जाती है।

चोपड़ा बताते हैं कि अब माता-पिता खासकर तब ट्रस्ट बना रहे हैं जब उनकी संतान की शादी किसी अलग जाति, धर्म या देश में हो रही हो, जहां तलाक के नियम और संस्कृति भिन्न होती है। यह ट्रस्ट तलाक की स्थिति में किसी भी तरह की कानूनी उलझन से परिवार को बचा सकता है।

बदलती सोच, बदलते तरीके

एक समय था जब ट्रस्ट सिर्फ वसीयत और पीढ़ी-दर-पीढ़ी संपत्ति के हस्तांतरण के लिए बनाया जाता था, लेकिन अब इसके उद्देश्यों में बदलाव आ गया है। अब इसे तलाक की आशंका को ध्यान में रखते हुए विशेष रूप से डिज़ाइन किया जा रहा है। भारत में प्रीनप्चुअल एग्रीमेंट (Prenuptial Agreement) का कोई स्पष्ट कानूनी आधार नहीं है, इसलिए ट्रस्ट एक मजबूत विकल्प के रूप में सामने आया है।

कानूनी सलाह जरूरी

हालांकि यह तरीका कानूनी रूप से प्रभावी है, लेकिन इसमें विशेषज्ञ की राय और सही दस्तावेजी प्रक्रिया बेहद जरूरी है। ट्रस्ट बनाने से पहले किसी अनुभवी वकील या वित्तीय सलाहकार से सलाह लेना अनिवार्य है ताकि भविष्य में किसी प्रकार की गड़बड़ी न हो।