Dabur V/S Patanjali विवाद: दिल्ली हाईकोर्ट ने भ्रामक विज्ञापनों पर लगाई रोक, रामदेव के दावों पर सवाल?

चंडीगढ़, 3 जुलाई: भारत की आयुर्वेदिक उत्पादों की दुनिया में दो दिग्गज कंपनियों — डाबर और पतंजलि — के बीच जारी कानूनी जंग ने एक नया मोड़ ले लिया है। दिल्ली हाईकोर्ट ने हाल ही में एक अंतरिम आदेश जारी करते हुए पतंजलि आयुर्वेद को निर्देश दिया है कि वह डाबर च्यवनप्राश को निशाना बनाकर कोई भी भ्रामक या प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाने वाला विज्ञापन भविष्य में न चलाए।

कोर्ट का यह सख्त रुख उस समय सामने आया जब डाबर ने अदालत में दावा किया कि पतंजलि जानबूझकर अपने प्रचार में उनके उत्पाद को “कमतर” और “प्रामाणिक आयुर्वेदिक परंपराओं से अलग” दिखा रहा है, जिससे उनकी बाज़ार में बनी प्रतिष्ठा और उपभोक्ताओं का विश्वास प्रभावित हो रहा है।

कैसे शुरू हुआ विवाद?

इस विवाद की जड़ें साल 2017 तक जाती हैं, जब डाबर ने पहली बार पतंजलि के खिलाफ अदालत में याचिका दायर की थी। तब भी अदालत ने पतंजलि को चेतावनी दी थी कि वह अपने प्रचार में प्रतिस्पर्धी कंपनियों की छवि खराब करने से बचे। इसके बाद कुछ समय तक मामला शांत रहा, लेकिन दिसंबर 2024 में डाबर ने एक नई याचिका के साथ कोर्ट का रुख किया।

डाबर का आरोप था कि पतंजलि अपने विज्ञापनों में सीधे तौर पर यह दावा कर रहा है कि केवल वही ब्रांड “शुद्ध आयुर्वेदिक” च्यवनप्राश बनाता है, जबकि बाकी कंपनियों को प्राचीन आयुर्वेद और वेदों की सही समझ नहीं है। इससे यह संकेत गया कि अन्य ब्रांड्स, विशेषकर डाबर, कम गुणवत्ता वाले या नकली उत्पाद बना रहे हैं।

डाबर के आरोप क्या हैं?

  1. झूठे और भ्रामक दावे: डाबर ने कोर्ट में कहा कि पतंजलि के प्रचार में 51 जड़ी-बूटियों के इस्तेमाल का दावा किया गया, जबकि परीक्षण में सिर्फ 47 पाई गईं।

  2. हानिकारक सामग्री का इस्तेमाल: डाबर ने पारे (mercury) जैसे तत्वों के संभावित उपयोग पर भी सवाल उठाए।

  3. सीधा निशाना: विज्ञापनों में कथित रूप से यह संदेश दिया गया कि “जिन्हें आयुर्वेद का ज्ञान नहीं, वे असली च्यवनप्राश नहीं बना सकते”, जिससे सीधा संदेश गया कि डाबर जैसे ब्रांड नकली हैं।

  4. प्रचार की तीव्रता: डाबर ने दावा किया कि यह विज्ञापन सिर्फ टीवी तक सीमित नहीं थे, बल्कि 3 दिन में 900 से ज़्यादा बार टीवी पर, और बड़े अखबारों में व्यापक रूप से दिखाए गए, जिससे उनकी ब्रांड छवि को नुकसान पहुंचा।

पतंजलि की दलील क्या रही?

रामदेव की कंपनी की ओर से पेश वकील जयंत मेहता ने कहा कि पतंजलि ने कभी किसी प्रतियोगी ब्रांड का नाम नहीं लिया और उनके सभी दावे उत्पाद की गुणवत्ता पर आधारित हैं।
उन्होंने यह भी तर्क दिया कि भारत में कंपनियों को अपनी विशेषताओं को उजागर करने का अधिकार है, बशर्ते वे तथ्यात्मक हों और किसी अन्य को सीधे नीचा न दिखाएं।

पतंजलि ने हवेल्स केस का उदाहरण देते हुए कहा कि प्रतिस्पर्धात्मक तुलना करना गैरकानूनी नहीं है, जब तक वह भ्रामक न हो। लेकिन कोर्ट ने इसे संतोषजनक नहीं माना।

कोर्ट की सख्ती और आदेश का असर

दिल्ली हाईकोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि पतंजलि के विज्ञापन उपभोक्ताओं को भ्रमित करने वाले हैं और इससे डाबर की साख को नुकसान हो सकता है। कोर्ट ने कंपनी को निर्देश दिया कि वह भविष्य में ऐसा कोई भी विज्ञापन न चलाए जो प्रतिस्पर्धी ब्रांड्स की छवि को धूमिल करता हो।

यह आदेश भले ही अंतरिम हो, लेकिन इसके दूरगामी असर हो सकते हैं — न केवल पतंजलि के लिए, बल्कि पूरे भारतीय विज्ञापन उद्योग के लिए।

क्या आगे बढ़ेगा विवाद?

अब सबकी निगाहें इस पर टिकी हैं कि क्या पतंजलि इस आदेश को ऊपरी अदालत में चुनौती देगी या कोर्ट के निर्देशों का पालन करेगी। फिलहाल पतंजलि की ओर से यह स्पष्ट नहीं हुआ है कि वे अगली रणनीति क्या अपनाएंगे।

यह सिर्फ व्यापारिक लड़ाई नहीं, उपभोक्ताओं की समझ और हक का सवाल

इस केस ने भारतीय बाजार में विज्ञापन की नैतिकता, उपभोक्ता संरक्षण और ब्रांड प्रतिस्पर्धा के स्तर पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। क्या प्रचार के नाम पर किसी कंपनी को दूसरों को नीचा दिखाने का अधिकार है? उपभोक्ता जो टीवी और अखबारों के जरिए संदेश ग्रहण करते हैं, क्या वे हमेशा सच्चाई से अवगत होते हैं?

दिल्ली हाईकोर्ट का यह आदेश एक उदाहरण बन सकता है कि व्यापार में सफलता का रास्ता ईमानदारी और पारदर्शिता से होकर ही जाता है।