चंडीगढ़, 2 जुलाई: कर्नाटक के हासन जिले में हाल ही में अचानक हुए दिल के दौरे (हार्ट अटैक) से 20 से अधिक लोगों की जान चली जाने की खबर ने राज्य ही नहीं, पूरे देश में चिंता की लहर दौड़ा दी। इन मौतों के बाद एक बार फिर सवाल उठने लगे कि क्या इनका कोई संबंध कोविड-19 वैक्सीनेशन से तो नहीं है?
जब से कोरोना महामारी फैली थी, तब से लेकर अब तक वैक्सीनेशन को महामारी की रोकथाम का सबसे प्रभावी उपाय माना गया। लेकिन अचानक युवाओं और अधेड़ उम्र के लोगों में हृदय संबंधी मौतों की संख्या बढ़ने के बाद सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक गलियारों तक इस बात को लेकर चर्चाएं तेज हो गईं कि कहीं यह कोरोना वैक्सीन का कोई देर से पड़ने वाला साइड इफेक्ट तो नहीं?
यह मामला तब और गहराया जब कर्नाटक सरकार को इस विषय पर विशेषज्ञ समिति गठित करनी पड़ी, जिससे लोगों की चिंताओं का समाधान हो सके और तथ्यों के आधार पर स्थिति स्पष्ट की जा सके।
स्वास्थ्य मंत्रालय और ICMR की रिपोर्ट से क्या निकला निष्कर्ष?
भारत सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय ने ICMR (भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद) और एम्स (AIIMS) की एक साझा रिपोर्ट का हवाला देते हुए स्पष्ट किया है कि इन मौतों और कोरोना वैक्सीन के बीच कोई प्रत्यक्ष या वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित संबंध नहीं मिला है।
रिपोर्ट के अनुसार, जिन लोगों की मृत्यु हुई, उनकी पृष्ठभूमि में गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं पहले से मौजूद थीं — जैसे कि हृदय रोग, मधुमेह (डायबिटीज), हाई ब्लड प्रेशर, और अनियमित जीवनशैली। इन स्थितियों में यदि समय पर इलाज नहीं मिले, तो अचानक हृदय गति रुकना या स्ट्रोक जैसी घटनाएं हो सकती हैं।
रिसर्च ने यह भी बताया कि कोरोना वैक्सीन ने भारत में लाखों लोगों को संक्रमण से बचाया और मृत्यु दर को काफ़ी हद तक कम किया। सोशल मीडिया पर जो अफवाहें फैल रही थीं, उनका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है।
कर्नाटक सरकार की चिंता और राजनीतिक प्रतिक्रिया
घटना की गंभीरता को देखते हुए मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने फौरन एक उच्चस्तरीय जांच समिति गठित करने के आदेश दिए। इस समिति का नेतृत्व जयदेव इंस्टिट्यूट ऑफ कार्डियोवैस्कुलर साइंसेज़ एंड रिसर्च के निदेशक डॉ. केएस रविंद्रनाथ को सौंपा गया। समिति को 10 दिनों में पूरी जांच करके रिपोर्ट पेश करनी थी।
मुख्यमंत्री ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट (पूर्व में ट्विटर, अब एक्स) पर यह भी कहा कि वैश्विक स्तर पर कुछ अध्ययनों में यह सामने आया है कि वैक्सीन से कुछेक मामलों में जटिलताएं हो सकती हैं। उन्होंने यह भी कहा कि भारत में जिस गति से इमरजेंसी परमिशन के तहत वैक्सीनेशन किया गया, उस पर पुनर्विचार और पारदर्शिता आवश्यक है।
इस बयान ने न केवल चिकित्सा जगत, बल्कि राजनीतिक स्तर पर भी चर्चा का विषय बना दिया।
हासन जिले के आंकड़े क्या बताते हैं?
स्वास्थ्य विभाग के मुताबिक, पिछले दो वर्षों में हासन जिले में कुल 507 हार्ट अटैक के मामले दर्ज हुए, जिनमें से 190 लोगों की जान चली गई। यह एक गंभीर आंकड़ा है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि इन मौतों की टाइमलाइन और वैक्सीनेशन के डोज़ के बीच कोई सीधा पैटर्न या तालमेल नहीं पाया गया है। इससे यह संकेत मिलता है कि इन घटनाओं के पीछे वैक्सीन नहीं, बल्कि स्वास्थ्य की पुरानी समस्याएं और जीवनशैली की लापरवाही मुख्य कारण रही।
कर्नाटक का वैक्सीनेशन अभियान: एक व्यापक पहल
कोरोना वैक्सीनेशन अभियान की शुरुआत पूरे देश के साथ कर्नाटक में भी 16 जनवरी 2021 से हुई थी। शुरुआती चरण में स्वास्थ्यकर्मियों और फ्रंटलाइन वर्कर्स को टीका लगाया गया। इसके बाद 45 वर्ष से ऊपर और फिर 18 से 44 वर्ष के बीच के लोगों को भी वैक्सीन दी गई।
राज्य भर में मुख्य रूप से कोविशील्ड और को-वैक्सीन का उपयोग किया गया। वैक्सीनेशन के लिए CoWIN पोर्टल और CoWIN Kar ऐप के ज़रिए स्लॉट दिए गए थे। स्टोरेज और वितरण की व्यवस्था बेंगलुरु, बेलगावी, मैसूरु, कलबुर्गी, दक्षिण कन्नड़, बगलकोट और चित्रदुर्ग जैसे ज़िलों में की गई थी।
अफवाहों से नहीं, तथ्यों से बनाएं राय
जब भी कोई अप्रत्याशित स्वास्थ्य घटना सामने आती है, तो समाज में आशंका और भय का माहौल बनता है। लेकिन ऐसी संवेदनशील स्थितियों में जरूरी है कि हम वैज्ञानिक शोध, मेडिकल रिपोर्ट और विशेषज्ञों की राय पर विश्वास करें, न कि सोशल मीडिया की अफवाहों पर।
भारत में कोरोना वैक्सीन ने लाखों ज़िंदगियों को बचाया है। हालांकि, यह भी उतना ही सच है कि किसी भी चिकित्सा हस्तक्षेप में दुष्प्रभाव की संभावना होती है, लेकिन उसे हर घटना का कारण मान लेना अनुचित और अवैज्ञानिक है।
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