छठ पूजा: “वो खरने का दिन होता है,जब घर में प्रवेश होता है छठी का”

छठ महापर्व इस साल 25 अक्तूबर से लेकर 28 अक्तूबर तक मनाया जा रहा है। छठ पूजा का महापर्व आज से शुरू हो गया है.

आज छठ पूजा का पहला दिन है. आज नहाय-खाय है. 28 अक्टूबर को उदयगामी सूर्य को अर्घ्य देने के साथ ही ये महापर्व संपन्न हो जाएगा.

छठ के दूसरे दिन को खरना कहा जाता है. खरना के दिन गुड़ की खीर और रोटी का प्रसाद बनाए जाने की परंपरा है.

ये प्रसाद मिट्टी के चूल्हे पर ही बनाया जाता है. इतना ही नहीं प्रसाद बनाने के लिए चूल्हे में लगाने के लिए सिर्फ आम की लकड़ी का उपयोग किया जाता है.

किसी दूसरी लकड़ी से यह प्रसाद नहीं बनाया जाता, लेकिन ऐसा करने के पीछे की वजह क्या है? आइए जानते हैं इसके पीछे की परंपरा और धार्मिक कारण.

छठ का दूसरा यानी खरने के दिन का खास महत्व धर्म शास्त्रों में बताया गया है.

खरना का अर्थ होता है. ‘शुद्धता’. खरने के दौरान व्रतियों के द्वारा स्वच्छता और पवित्रता का पूरा ध्यान रखा जाता है.

मान्यताओं के अनुसार, वो खरने का दिन होता है, जब छठी का घर में प्रवेश होता है. खरना का दिन पूर्ण रूप से भक्ति और समर्पण का माना जाता है. इस दिन सूर्य देव और छठी मैया का आशीर्वाद मिलता है.

खरना पूजा की विधि

छठ पर्व के दूसरे दिन खरना किया जाता है और इस दिन को बेहद अहम माना जाता है। व्रती इस पूरे दिन व्रत रखने के बाद शाम को पूजा के बाद प्रसाद ग्रहण करते हैं।

इसके बाद अगले 36 घंटों तक निर्जला व्रत रखा जाता है।

इस दिन नीचे दी गई विधि से आपको व्रत का पालन करना चाहिए।

खरना के दिन सूर्योदय से पहले उठकर आपको स्नान-ध्यान करना चाहिए।

इसके बाद छठी माता और सूर्य देव का ध्यान करते हुए पूरे दिन भर निर्जला व्रत का संकल्प आपको लेना चाहिए।

छठ पर्व पवित्रता का प्रतीक भी है, इसलिए खरना वाले दिन व्रत का संकल्प लेने के बाद आपको पूरे दिन शुद्धता बरतनी चाहिए।

नकारात्मक विचार मन में नही लाना चाहिए इसलिए धार्मिक पुस्तकों का अध्ययन आप कर सकते हैं।

खरना की मुख्य पूजा शाम के समय होती है इसलिए शाम की पूजा से पहले व्रत लेने वाले व्यक्ति को पूजा में इस्तेमाल होने वाली चीजों को साफ करना चाहिए,

साथ ही पूजा स्थल की भी सफाई करनी चाहिए।

प्रसाद तैयार होने के बाद आपको छठी माता और सूर्य देव की पूजा करनी चाहिए।

 खरना के दिन व्रती महिलाओं द्वारा मिट्टी के नए चूल्हे पर गुड़ और चावल की खीर बनाई जाती है.

ये खीर पीतल के बर्तन में गुड़, चावल और दूध से तैयार की जाती है.

साथ ही गेहूं के आटे से बनी रोटी, पूड़ी या ठेकुआ बनाया जाता है.

इस खीर का भोग छठी मैया को लगता है.

इसके बाद इसे सभी लोग प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं.

फिर 36 घंटे का निर्जला व्रत शुरू होता है

खरना का महत्व

खराना करने के बाद 36 घंटे के व्रत की शुरुआत होती है । खरने के दिन का खास महत्व धर्म शास्त्रों में बताया गया है. खरना का अर्थ होता है. ‘शुद्धता’

खरने के दौरान व्रतियों  द्वारा स्वच्छता और पवित्रता का पूरा ध्यान रखा जाता है.

मान्यताओं के अनुसार, वो खरने का दिन होता है, जब छठी का घर में प्रवेश होता है.

खरना का दिन पूर्ण रूप से भक्ति और समर्पण का माना जाता है. इस दिन सूर्य देव और छठी मैया का आशीर्वाद मिलता है.

इस दिन बनाए गए प्रसाद को घर के लोगो के साथ अन्य लोगों में भी बांटा जाता है।