चंडीगढ़, 1 जुलाई: भारत एक बार फिर दुनिया में सबसे अधिक रेमिटेंस पाने वाले देश के रूप में सामने आया है। वित्तीय वर्ष 2024-25, जो कि 31 मार्च को समाप्त हुआ, उसमें भारत को प्रवासी भारतीयों से कुल 135.46 अरब डॉलर (लगभग 11.63 लाख करोड़ रुपये) प्राप्त हुए हैं। यह अब तक किसी भी एक वर्ष में भारत को मिली सबसे बड़ी रेमिटेंस राशि है। इस आंकड़े ने देश की आर्थिक मजबूती में प्रवासी भारतीयों के अहम योगदान को और भी साफ कर दिया है।
साल भर में 14% की बढ़ोतरी, 8 साल में रेमिटेंस हुआ दोगुना
इस बार भेजी गई राशि में 14.24 प्रतिशत की वार्षिक बढ़ोतरी दर्ज की गई है। यदि हम 8 साल पहले यानी वित्तीय वर्ष 2016-17 की तुलना करें, जब प्रवासी भारतीयों ने लगभग 61 अरब डॉलर भेजे थे, तो आज की राशि उससे दोगुने से भी ज्यादा है। इससे यह संकेत मिलता है कि विदेशों में बसे भारतीयों की आय और आर्थिक स्थिति में लगातार सुधार हो रहा है, और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय श्रमिकों व पेशेवरों की मांग तेजी से बढ़ रही है।
अमेरिका, ब्रिटेन और सिंगापुर से आया सबसे ज़्यादा पैसा
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की रिपोर्ट के अनुसार, कुल रेमिटेंस का लगभग 45% हिस्सा अमेरिका, यूनाइटेड किंगडम (ब्रिटेन) और सिंगापुर से आया है। इन देशों में बसे भारतीयों की संख्या और उनकी आय दोनों ही ऊँचाई पर हैं।
इसके विपरीत, खाड़ी देशों से रेमिटेंस में थोड़ी गिरावट देखी गई है। इसका मुख्य कारण तेल की कीमतों में आई कमी है, जिससे इन देशों में काम कर रहे लोगों की आमदनी पर असर पड़ा है। हालाँकि, पश्चिमी देशों से आए रिकॉर्ड फंड ने इस कमी की भरपाई कर दी।
एक दशक से बना हुआ है विश्व का नंबर-1 देश
विश्व बैंक के अनुसार, भारत पिछले 10 वर्षों से लगातार दुनिया में सबसे ज्यादा रेमिटेंस प्राप्त करने वाला देश बना हुआ है। 2024 में भी भारत पहले स्थान पर रहा। भारत के बाद मेक्सिको (लगभग 5.8 लाख करोड़ रुपये) और चीन (करीब 4.1 लाख करोड़ रुपये) दूसरे और तीसरे पायदान पर हैं।
रेमिटेंस से व्यापार घाटे में बड़ी राहत
भारतीय रिजर्व बैंक की रिपोर्ट यह भी बताती है कि रेमिटेंस केवल घरेलू परिवारों के लिए आय का जरिया नहीं है, बल्कि यह देश की आर्थिक संरचना का एक मज़बूत स्तंभ बन चुका है। 2024-25 में भारत का कुल व्यापार घाटा 287 अरब डॉलर रहा, जिसमें से करीब 47% की भरपाई रेमिटेंस के माध्यम से की गई।
यह दर्शाता है कि विदेशों में रहने वाले भारतीय केवल अपने परिवारों को ही आर्थिक सहायता नहीं भेज रहे, बल्कि वे भारत की अर्थव्यवस्था को भी मज़बूत बनाने में बेहद अहम भूमिका निभा रहे हैं।
रेमिटेंस: अब परिवारों की मदद नहीं, राष्ट्र निर्माण का हिस्सा
आज रेमिटेंस केवल घर खर्च चलाने या रिश्तेदारों की मदद करने का जरिया नहीं रह गया है। यह भारत की राष्ट्रीय आर्थिक रणनीति का एक आवश्यक अंग बन चुका है। विदेशी मुद्रा भंडार को मज़बूत करने, रुपए को स्थिर रखने और व्यापार घाटे को संतुलित करने में इसकी भूमिका काफी महत्वपूर्ण होती जा रही है।
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